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षोडश कलाओं का विवेचन ( 16 कला )


वाचस्पत्यम् में “कला” शब्द की वयुत्पत्ति इन शब्दों में विवेचित है –

कलयति कलते वा कर्तरि अच्, कल्यते ज्ञायते कर्मणि अच् वा ।
अर्थात् जो किसी के कर्म अथवा स्थिति को द्योतित करती है, वह कला है । जैसे चंद्रमा के सोलहवें भाग को एक कला कहते हैं – यथा,

चंद्रमण्डलस्य षोडशे भागे यथा च चंद्रस्य षोडशभागस्य कला शब्द वाच्यत्वम् (वाचस्पत्यम् )।

श्रुतियाँ भी सोलह कलाओ की बात करता हैं , जैसे की –

षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टाभूत् साऽन्ने-नोपसमाहिता प्रज्वालीत्।

(अर्थात – परमात्मा की सोलह कलाओं में एक कला अन्न में मिलकर अन्नमय कोश के द्वारा प्रकट हुई।)

हमारा यजुर्वेद भी उद्घोष करते हुए कहता हैं कि “सचते स षोडशी”—-(यजुर्वेद–8.36)

षोडश मातृका

षोडश मातृका

परमात्मा ने अग्नि, सबर्य और विद्युत् इन तीन ज्योतियों को प्रजा के प्रकाश के लिए रच के संयुक्त किया है और जिसका नाम षोडशी है। इन्हें कला कहा जाता है। ये कुल 16 हैं। ये सब ईश्वर के मध्य हैं। इनका वर्णन प्रश्नोपनिषद् के छठा प्रश्न में आया हैः—–

(1.) ईक्षण अर्थात् यथार्थ विचार,
(2.) प्राणः–प्राण जो कि सब विश्व का धारण करने वाला है।
(3.) श्रद्धा सत्य में विश्वास,
(4.) आकाश,
(5.) वायु,
(6.) अग्नि,
(7.) जल,
(8.) पृथिवी,
(9.) इन्द्रिय,
(10) मन अर्थात् ज्ञान,
(11) अन्न,
(12) वीर्य अर्थात् बल और पराक्रम,
(13) तप अर्थात् धर्मानुष्ठान सत्याचार,
(14) मन्त्र अर्थात् वेदविद्या,
(15) कर्म अर्थात् सब चेष्टा,
(16) नाम अर्थात् दृश्य और अदृश्य पदार्थों की संज्ञा।

यों तो तिथियाँ पंद्रह होती हैं; कितु प्रतिपदा से चतुर्दशी तक 14 तिथियाँ दोनों पक्षों मे उभयनिष्ठ हैं । इनमें चंद्र्मा के घटने -बढने की 14 कलाएँ होती हैं। अमावस्या और पूर्णीमा ये दोनों दो कलाएँ हो गयीं । अतः चंद्रमा की सोलह कलाएँ हुईं ।

चंद्रमा के कलाओं का वर्णन कुछ इस प्रकार है:-

1. अमृता
2.मानदा
3. पूषा
4. तुष्टि
5. पुष्टि
6. रति
7. धृति
8. शशिनी
9. चन्द्रिका
10. कान्ति
11. ज्योत्स्ना
12. श्री
13. प्रीतिरङ्गा
14. पूर्णा
15. स्वरजा

चंद्रमा के सोलह भाग जो एक -एक क्रम में शुक्ल पक्ष में बढ़ते हैं और कृष्ण पक्ष में कम होते है | 

इसी प्रकार सूर्य की भी द्वादश कलाएँ वर्णीत हैं ।इन्हें द्वादशादित्य भी कहते हैं ।

सूर्य की कलाएं कुछ इस प्रकार वर्णित हैं –

1. तपिनी
2. तापिनी
3. धूम्रा
4. मरीचि
5. ज्वालिनी
6. रुचि
7. सुषुम्ना
8. भोगदा
9. विश्वा
10. बोधिनी
11. धारिणी
12. क्षमा

वैसे सम्पूर्ण कलाएँ चौसठ बतायी गयीं हैं ; जो पूर्णतया परब्रह्म में मानी जाती है । वैदिक मान्यतानुसार परब्रह्म का त्रिपाद् ऊर्ध्वलोकों में और एक पाद् (चतुर्थांश) भूलोक (विश्व-ब्रह्माण्ड के रूप में ) व्याप्त है । यथा :-

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोस्येहा भवत्पुनः … ऋग्वेद 10:90:4 ॥

इसी कारण भूलोक पर 16 कलाएँ ही विद्यमान हैं और इन्हें ही “पूर्ण कला” कहा जाता है ।

मनुष्य के सोलह विशिष्ठ गुणों या शक्तियों को भी षोडशकला कहते है | इस तथ्य की पुष्टि हमारे ब्राह्मण ग्रंथो से होती है .—(षोडशकलो वै चन्द्रमः —)—(षोडशकलो वै पुरुषः —शतपथ ब्राह्मण )…..उस पूर्ण ब्रह्म को भी षोडशकला कहकर वर्णित किया गया है —-( षोडशकलो वै ब्रह्म )…….यहाँ तक कि इस सम्पूर्ण जगत को भी षोडशकला युक्त माना गया है —-(षोडशकलं वा इदं सर्वं —शतपथ ब्राह्मण)

यहाँ षोडश संख्या पूर्णता का बोधक है | वस्तुतः ब्रह्म की 64 कलाए मानी जाती है , चूँकि ब्रह्म के 3 चरण उर्ध्व में विधमान है और एक चरण ही इस ब्रहमांड के रूप में है .इसका संकेत हमें पुरुष सूक्त में प्राप्त होता है |

अवतारों के विषय में कलाओं का वर्णन मिलता है । जैसे श्रीकृष्ण सोलह कला के पूर्ण अवतार माने जाते हैं ।

वस्तुतः जीवमात्र में एक-दो कलाएँ होती हैं और जैसे-जैसे वह अपने को विकसित करता जाता है; वैसे-वैसे वह अपने को विकसित करता जाता है; वैसे-वैसे उसकी कलाएँ भी बढती जाति हैं । जैसे उद्भिज्जों में एक (अन्नमय) कला होती है अर्थात् ये भोजन ग्रहण करते व विकसित होते हैं; इसी प्रकार स्वेदजों में दो कलाएं (अन्नमय व प्राणमय) होती हैं । अण्डजों में तीन कलाएं (अन्नमय, प्राणमय व मनोमय) होती हैं। जरायुजों में चार कलाएं (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय व विज्ञानमय) होती हैं ।

मानवों में अन्नमय, प्राणमय, मनोमय व विज्ञानमय के अतिरिक्त एक और कला भी होती हैं आनन्दमय । कुछ विशिष्ट महामनवों में उपर्युक्त पांच कलाओं (पंचकोशों) के अतिरिक्त तीन अन्य कलाएँ भी देखी जाती हैं तथा वह विकसित व जागृत होती हैं ।

वो कलाएँ इस प्रकार हैं:-

1. अतिशायिनि कला – इसी कला के प्रभाव से आदिगुरु आद्यशंकराचर्य जी ने 10-12 वर्ष की अवस्था में वह कार्य सम्पन्न कर लिया था , जो सामान्य मानव के लिये कल्पनातीत हैं ।

2. विपरिणामिनी कला:- इस कला के द्वारा मनुष्य को अष्ट-सिद्धियाँ हस्तगत होती हैं । परकाया-प्रवेश , प्राण-प्रत्यावर्तन आदि इसी के प्रभाव से होते हैं ।

3. संक्रामिणी कला:- इस कला के प्रभाव से ही साधक अपनी शक्ति को दूसरों मे प्रविष्ट कर सकने योग्य होते हैं ।

उपर्युक्त कलाएँ मानवों तक सीमित है , इसके ऊपर की 9 से 16 तक की कलाएँ देवों व अवतारों में होती हैं ।

भूलोक में पूर्णकलाएँ 16 मानी गयी हैं ।भगवान् श्रीकृष्ण षोडश कलायुक्त पूर्णावतार माने जाते हैं । देवों -अवतारों की बाकी कलाएँ इस प्रकार हैं :-

1. प्रभ्वी कला:- इसका अर्थ ईश्वर की उस परिभाषा से सम्बंधित हैं, जिसमें उन्हें ‘कर्तुं अकर्तुं अन्यथाकर्तुं समर्थ प्रभु’ कहा गया है अर्थात् असम्भव को भी सम्भव कर दिखाना – जैसे खम्भे में से नृसिंह अवतार ।

2. कुण्ठिनी कला:- इस कला से पञ्चमहाभूतों को प्रभावित किया जा सकता है । जैसे परमेश्वर शिव् ने हलाहल का पान कर लिया और कंठ मे समाहित कर लिया और सृष्टि के विनाश की क्षमता वाले विष को को प्रभावहीन किया ।

3. विकासिनी कला:- इसी कला के द्वारा भगवान् वामन ने केवल तीन पगों में ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को माप लिया था ।

4. मर्यादिनी कला:- इसी कला के प्रभाव से ही भगवान् श्रीराम सवशक्ति सम्पन्न होते हुए भी मर्यादाओं में बंधे रहे व मर्यादा-पुरुषोत्तम कहलाये ।

5. संह्रादिनी कला:- इसी कला का प्रभाव था कि पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण अऋतु में फूल-फल आदि उत्पन्न किये थे । इस कला का इतना प्रभाव है कि प्रकृतिगत कार्यों में हस्तक्षेप किया जा सकता है व उसको सुनियोजित किया जा सकता है ।

6. आह्लादिनी कला:- इसी कला से ही श्रीराधिका जी ने नित्य श्रीकृष्ण जी के साथ रहकर उनका सायुज्य प्राप्त किया था ।

7. परिपूर्ण कला

8. स्वरूपावस्थिति कला:- इस कला के द्वारा सम्पूर्ण कलाओं को समेटकर अपने मूलरूप में अवस्थित हुआ जा सकता है । जैसे द्वापर युग मे भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी सभी कलाओं को समेटकर मूलरूप में धारण किया था , जिससे उन्हें पूर्ण कला अवतार माना जाता है ।

सन्दर्भ ग्रन्थ :- उपनिषद् , ब्रह्मविद्या खण्ड, पँ. श्रीराम शर्मा आचार्य जी


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