प्राणमय कोश की साधना – 6

मुद्रा – विज्ञान

मुद्राओं से ध्यान में तथा चित्त को एकाग्र करने में बहुत सहायता मिलती है। इनका प्रभाव शरीर की आंतरिक ग्रन्थियों पर पड़ता है। इन मुद्राओं के माध्यम से शरीर के अवयवों तथा उनकी क्रियाओं को प्रभावित, नियन्त्रित किया जा सकता है। विभिन्न प्रकार के साधना के उपचार क्रमों में इन्हें विशिष्ट आसन, बंध तथा प्राणायामों के साथ किया जाता है। मुद्रायें यों तो अनेक हठयोग के अन्तर्गत वर्णित हैं। अनेक प्रयोजनों के लिए उनका अलग-अलग महत्व है। उनमें कुछ ध्यान के लिए उपयुक्त हैं, कुछ आसनों की पूरक हैं, कुछ तान्त्रिक प्रयोगों एवं हठयोग के अंगों के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन सबके विस्तार में जाना न तो उपयोगी है और न आवश्यक।

प्रस्तुत पंचकोश अनावरण के अन्तर्गत जिन मुद्राओं को महत्वपूर्ण पाया गया है उनका विवरण यहाँ दिया जा रहा है। वे हैं-      

(१) महामुद्रा

(२) खेचरी मुद्रा

(३) विपरीत करणी मुद्रा

(४) योनि मुद्रा

(५) शाम्भवी मुद्रा

(६) अगोचरी मुद्रा

(७ )भूचरी मुद्रा

(१) महामुद्रा

बाएँ पैर की एडी़ को गुदा तक मूत्रेन्द्रिय के बीच सीवन भाग में लगावें और दाहिना पैर लम्बा कर दीजिए। लम्बे किये हुए पैर के अँगूठे को दोनों हाथों से पकड़े रहिये। सिर को घुटने से लगाने का प्रयत्न कीजिए। नासिका के बाएँ छिद्र से साँस पूरक खींचकर कुछ देर कुम्भक करते हुए दाहिने छिद्र से रेचक प्राणायाम कीजिए। आरम्भ में पाँच प्राणायाम बाईं मुद्रा से करने चाहिये, फिर दाएँ पैर को सकोड़कर गुदा भाग से लगायें और बाएँ पैर को फैलाकर दोनों हाथों से उसका अँगूठा पकड़ने की क्रिया करनी चाहिये। इस दशा में दाएँ नथुने से पूरक और बाएँ से रेचक करना चाहिये। जितनी देर बाएँ भाग से यह मुद्रा की थी उतनी ही देर दाएँ भाग से करनी चाहिये।

Mahamudra

Mahamudra

इस महा-मुद्रा से कपिल मुनि ने सिद्धि प्राप्त की थी। इससे अहंकार, अविद्या, भय द्वेष, मोह आदि के पंच क्लेशदायक विकारों का शमन होता है। भगन्दर, बवासीर, सग्रहिणी, प्रमेह आदि रोग दूर होते हैं। शरीर का तेज बढ़ता है और वृद्धावस्था दूर हटती जाती है।

(२) खेचरी मुद्रा

जीभ को उलटी करके उसे उलटना और तालू के गड़्ढे में जिह्वा का अग्र भाग लगा देने को खेचरी मुद्रा कहते हैं। तालू के गट्टे भाग में एक पोला स्थान है जिसमें आगे चलकर माँस की एक सूँड सी लटकती है, उसे कपिल कुहर भी कहते हैं। यही स्थान जिह्वा के अग्रभाग को लगाने का होता है।

प्राचीनकाल में जिह्वा को लम्बी करने के लिए कुछ ऐसे उपाय काम में लाये गये थे, जो वर्तमान परिस्थिति में आवश्यक नहीं है। १-जिह्वा को इस तरह दुहना जैसे पशु के थन को दुहते हैं, २-जिह्वा को शहद, कालीमिर्च आदि से सहलाते हुए आगे की ओर सूँतना या खींचना, ३-जीभ के नीचे नाड़ी तन्तुओं को काट देना, ४-लोहे की शलाका से दबा-दबा कर जीभ बढ़ाना। यह क्रिया देश, काल, ज्ञान की वर्तमान स्थिति के अनुरूप नहीं है। जैसे अब प्राचीनकाल की भाँति हजारों वर्ष तक निराहार तप कोई नहीं कर सकता, वैसे ही खेचरी मुद्रा के लिए जिह्वा बढ़ाने के लिए कष्टसाध्य उपाय भी अब असामयिक हैं।

काली मिर्च और शहद की जिह्वा पर हल्की मालिश कर देने से वहाँ के तन्तुओं में उत्तेजना आ जाती है और उसे पीछे की ओर लौटने में सहायता मिलती है। इस रीति से जिह्वा के अग्रभाग को तालु गह्वर में लगाने का प्रयत्न करना चाहिये। जिह्वा धीरे-धीरे चलती रहे, जिसमें तालु गह्वर की हल्की-सी मालिश होती रहे। भूमध्य भाग में रखनी चाहिये।

खेचरी मुद्रा कपाल गह्वर में होकर प्राण-शक्ति का संचार होने लगता है और सहस्रदल कमल में अवस्थित अमृत निर्झर झरने लगता है, जिसके आस्वादन से एक बड़ा ही दिव्य आनन्द आता है। प्राण की उधर्वगति हो जाने से मृत्यु काल में जीव ब्रह्मरन्ध्र में होकर ही प्रयाण करता है, इसलिए उसे मुक्ति या सद्गति प्राप्त होती है। गुदा आदि अधोमार्गों से प्राण निकलता है, वह नरकगामी तथा मुख, नाक, कान से प्राण छोड़ने वाला मृत्युलोक में भ्रमण करता है, किन्तु जिसका जीव ब्रह्मरन्ध्र में होकर जायेगा वह अवश्य ही सद्गति को प्राप्त करेगा। खेचरी मुद्रा द्वारा ब्रह्माण्डस्थित शेषशायी सहस्रदल निवासी परमात्मा से साक्षात्कार होता है। यह मुद्रा बड़ी ही महत्वपूर्ण है।

(३) विपरीत करणी मुद्रा- मस्तक को जमीन पर रखकर दोनों हाथों को उसके समीप रखना और पैरों को सीधे ऊपर की ओर उल्टे करना इसे विपरीत करणी मुद्रा कहते हैं। शीर्षासन भी इसी का नाम है। सिर का नीचा और पैर का ऊपर होना इसका प्रधान लक्षण है।

तालू के मूल से चन्द्र नाड़ी और नाभि के मूल से सूर्य नाड़ी निकलती है। इन दोनों के उद्गम स्थान विपरीत-करणी मुद्रा द्वारा सम्बन्धित हो जाते हैं। ऋषि-प्राण और धन-प्राण का इस मुद्रा द्वारा एकीकरण होता है। जिससे मस्तिष्क को बल मिलता है।

(४) योनि मुद्रा- इसे षड्मुखी भी कहते हैं। पद्मासन पर बैठकर दोनों हाथों के अँगूठों से दोनों कान, दोनों हाथ की तर्जानियों से दोनों आँखें, दोनों मध्यमाओं से दोनों कानों के छिद्र और दोनों अनामिकाओं से मुँह बन्द कर देना चाहिये। होठों को कौए की चोंच की तरह बाहर निकाल कर धीरे-धीरे साँस खींचते हुए उसे गुदा तक ले जाना चाहिये। फिर उल्टे क्रम से धीरे-धीरे निकाल देना चाहिये। योनि मुद्रा की यह साधना योग सिद्धि में बड़ी सहायक सिद्ध होती है।

(५) शाम्भवी मुद्रा- आसन लगाकर दोनों भौहों के बीच में दृष्टि को जमाकर भ्रकुटी में ध्यान करने को शाम्भवी मुद्रा कहते हैं। कहीं-कहीं अधखुले नेत्र और ऊपर चढ़ी हुई पुतलियों से जो शान्त चित्त ध्यान किया जाता है उसे भी शाम्भवी मुद्रा कहा है। भगवान शम्भू के द्वारा साधित होने के कारण इन साधनाओं का नाम शाम्भवी मुद्रा पड़ा है।

(६) अगोचरी मुद्रा-नासिका से चार उँगली आगे के शून्य स्थान पर दोनों नेत्रों की दृष्टि को एक बिन्दु पर केन्द्रित करना।

(७) भूचरी मुद्रा – नासिका से चार अंगुल आगे के शून्य स्थान पर दोनों नेत्रों की दृष्टि को एक बिंदु पर केंद्रित करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त नभो मुद्रा, महा-बंध शक्तिचालिनी मुद्रा, ताडगी, माण्डवी, अधोधारण ,आम्भसी, वैश्वानरी, बायवी, नभोधारणा, अश्वनी, पाशनी, काकी, मातंगी, धुजांगिनी आदि २५ मुद्राओं का घेरण्ड-सहिता में सविस्तार वर्णन है। यह सभी अनेक प्रयोजनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। प्राणमय कोश के अनावरण में जिन मुद्राओं का प्रमुख कार्य है, उनका वर्णन ऊपर कर दिया है। अब ९६ प्राणायामों में से प्रधान १ प्राणायामों का उल्लेख नीचे करते हैं।

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

प्राणमय कोश की साधना – 5

तीन बन्ध

दस प्राणों को सुसुप्त दशा से उठाकर जागृत करने, उसमें उत्पन्न हुई कुप्रवृत्तियों का निवारण करने, प्राण शक्ति पर परिपूर्ण अधिकार एवं आत्मिक जीवन को सुसम्पन्न बनाने के लिए प्राण-विद्या’ का जानना आवश्यक है। जो इस विद्या को जानता है, उसको प्राण सम्बन्धी न्यूनता एवं विकृति के कारण उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ दुःख नहीं देती।

प्राण विद्या को ही हठयोग भी कहते हैं। हठयोग के अन्तर्गत प्राण परिपाक के लिए (१) बंध, (२) मुद्रा और (३) प्राणायाम के साधन बताये गये हैं। तीन बन्ध और प्राणायामों का वर्णन नीचे किया जाता है।

(१) मूल बंध

प्राणायाम करते समय गुदा के छिद्रों को सिकोड़कर ऊपर की ओर खींचे रखना मूल-बंध कहलाता है। गुदा को संकुचित करने से ‘अपान’ स्थिर रहता है। वीर्य का अधः प्रभाव रुककर स्थिरता आती है। प्राण की अधोगति रुककर ऊर्ध्वगति होती है। मूलाधार स्थित कुण्डलिनी में मूल-बंध से चैतन्यता उत्पन्न होती है। आँतें बलवान होती हैं, मलावरोध नहीं होता रक्त-संचार की गति ठीक रहती है। अपान और कूर्म दोनों पर ही मूल-बंध का प्रभाव रहता है। वे जिन तन्तुओं में बिखरे हुए फैले रहते हैं, उनका संकुचन होने से यह बिखरापन एक केन्द्र में एकत्रित होने लगता है।      

Mula Bandh

Mula Bandh

mulabandh

२) जालंधर बंध

मस्तक को झुकाकर ठोड़ी को कण्ठ-कूप ( कण्ठ में पसलियों के जोड़ पर गड्डा है, उसे कण्ठ-कूप कहते हैं ) में लगाने को जालंधर-बंध कहते हैं। जालंधर बंध से श्वास-प्रश्वास क्रिया परअधिकार होता है।  ज्ञान-तन्तु बलवान होते हैं। हठयोग में बताया गया है कि इस बन्ध का सोलह स्थान की नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है। १-पादांगुष्ठ, २-गुल्फ, ३-घुटने, ४-जंघा, ५-सीवनी, ६ -लिंग, ७-नाभि, ८-हदय, ९-ग्रीवा १०-कण्ठ ११-लम्बिका, १२-नासिका, १३-भ्रू, १४-कपाल, १५-मूर्धा और १६-ब्रह्मरंध्र। यह सोलह स्थान जालंधर बंध के प्रभाव क्षेत्र हैं, विशुद्धि चक्र के जागरण में जालंधर बन्ध से बड़ी सहायता मिलती है।

Jalandhar Bandh

Jalandhar Bandh

३) उड्डियान बंध

पेट में स्थित आँतों को पीठ की ओर खींचने की क्रिया को उड्डियान बंध कहते हैं। पेट को ऊपर की ओर जितना खींचा जा सके उतना खींचकर उसे पीछे की ओर पीठ में चिपका देने का प्रयत्न इस बंध में किया जाता है। इसे मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाला कहा गया है।

uddiyana-bandha

जीवनी शक्ति को बढ़ाकर दीर्घायु तक जीवन स्थिर रखने का लाभ उड्डियान से मिलता है। आँतों की निष्क्रियता दूर होती है। अन्त्र पुच्छ, जलोदर, पाण्डु यकृत वृद्धि, बहु मूत्र सरीखे उदर तथा मूत्राशय के रोगों में इस बंध से बड़ा लाभ होता है। नाभि स्थित ‘समान’ और ‘कृकल’ प्राणों से स्थिरता तथा बात, पित्त कफ की शुद्धि है। सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुलता है और स्वाधिष्ठान चक्र में चेतना आने से वह स्वल्प श्रम से ही जागृत होने योग्य हो जाता है।

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

प्राणमय कोश की साधना – 4

पांच महाप्राणऔर पांच लघुप्राण

 

मनुष्य शरीर में दस जाति के प्राणों का निवास है । इनमे से पांच को महाप्राण और पांच को लघुप्राण कहते हैं ।

प्राण, अपान, सामान, उदान, व्यान यह पांच महाप्राण हैं ।

नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय, यह पांच लघुप्राण हैं ।

शरीर में कुछ ऐसे भ्रमर हैं, जिनमे जाने से प्राण तत्व की क्रिया एवं स्थिति उन भ्रमरों के अनुकूल ही हो जाती है । बिजली की धारा बल्व के स्पर्श से प्रकाश करती है , पंखे के साथ मिलकर हवा करती है, मोटर में आकर ताकत पैदा करती है, रेडियो में उसका कार्य ध्वनि को पकड़ना होता है । प्राण तत्व एक प्रकार की विद्युत् शक्ति के समान है । बहते हुए पानी में जैसे भ्रमरों के गड्ढे पड़ते हैं , वैसे ही सूक्ष्म शरीर में कुछ ऐसे भ्रमर हैं जिनके साथ प्राण का सम्मिश्रण होने से एक विशेष प्रक्रिया की जाती है ।

पाँच महाप्राणो को ओजस् और पांच लघुप्राणो को रेतस कहते हैं । दोनों प्राण एक दूसरे के सहायक एवं पूरक हैं । दोनों नेत्र, दोनों नथुने, दोनों कान, दोनों हाथ पैर एक दूसरे में सहायक एवं साथी है। इसी प्रकार, महाप्राण व् लघुप्राण भी आपस में सम्बद्ध व् सहायक हैं । इनको एक ही प्राण के दो भाग कहा जा सकता है। एक होते हुए भी कुछ भेदों के कारण मस्तिष्क को अगला व् पिछला दो भागो में बांटा गया है, वैसे ही प्राण तत्वों में भी दो तारह के विभाजन हुए हैं ।

प्राण वायु का निवास स्थान हृदय है। नाग भी उसके समीप रहता है। अपान गुदा और मूत्रेंद्रियो के बिच में मूलाधार के निकट रहता है, उसी के पास कूर्म लघुप्राण का निवास है । सामान और कृकल नाभि में रहते हैं । उदान और देवदत्त का स्थान कंठ है। व्यान और धनञ्जय में आकाश तत्व का अधिक मिश्रण रहने से ये सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहते हैं पर उसका प्रधान केंद्र मस्तिष्क का मध्य भाग है।

साधारणतः ऐसा माना जाता है कि प्राण के द्वारा शब्द एवं मस्तिष्क का पोषण होता है । अपान से मल मूत्र स्वेद आदि का विसर्जन होता है। समान से पाचन, परिपाक, और उष्णता का संचार होता है। उदान विविध वस्तुएं बाहर से शरीर के भीतर ग्रहण करता है। व्यान का काम रक्त संचार है । लघु प्राणों में नाग से डकार आती है। कूर्म से पलक झपकने के क्रिया होती है। कृकल से छींके और देवदत्त से जम्हाई आती है। धनञ्जय जीवित अवस्था में शरीर का पोषण करता है और मरने पर देह को सड़ा गला कर शीघ्र नष्ट करने का प्रबंध करता है।

ये मान्यताएं सर्वांगपूर्ण नहीं है। जिस स्थान पर जिस प्राण का निवास बताया गया है, वहां एक प्रकार के वायु भ्रमर होते हैं , जिनमें प्राणों का विशेष संचार रहता है। गर्मी के दिनों में जलवायु अधिक गरम।हो जाती है तो एक प्रकार के वायु भ्रमर उत्पन्न होते हैं , जो घूमते हुये नाचते हुये अंधड़ की तरह आगे चलते हैं , उसी प्रकार के कुछ भ्रमर शरीर में पाये जाते हैं ।

सूक्ष्म निरीक्षण करने पर पता चलता है कि इन स्थानों पर शरीरगत वायु और प्राण की उष्णता के कारण एक प्रकार के भ्रमर चक्र उत्पन्न हो जाते हैं । भ्रमर सदा ऊपर चौड़े होते हैं और निचे की तरफ ढलवां होते जाते हैं तथा अंत में बाहूत ही छोटे नोक मात्र हो जाते हैं । ऊपर के सबसे चौड़े भाग को स्तर और निचे के सबसेइ नुकिले भाग को बिंदु कहते हैं। इसी प्रकार वायउ के भ्रमर के ऊर्ध्व भाग महाप्राण और अधो भाग लघुप्राण कहा जाता है । एक स्तर है तो दूसरा बिंदु। वस्तुतः दोनों एक ही महातत्व के दो विभाग मात्र हैं ।

Distribution of Prana in Human Body

Distribution of Prana in Human Body

प्राण

प्राण वायु का निवास स्थान हृदय है । वस्तुतः प्राण का कार्य जीवन चलाना है । हृदय की धड़कन जीवन की प्रतिक है । घडी में फिनर की ऐंठ ही सब का पुर्जों को चलाती है । फिनर की चाबी नष्ट हो जाये तो पुर्जों का चलना बंद हो जायेगा । प्राण के द्वारा हृदय की धड़कन होती है , फिर उससे रक्त संचार होता है , साँस आ जाती है, इसके बाद शरीर की अन्य क्रियाएँ होती है।

प्राण में शिथिलता आने पर जीवनी शक्ति घट जाती है और उसके अत्यंत न्यून होने पर हृदय की धड़कन बंद हो जाती है । समाधि लगाने वाले महात्माओ का प्राण लर अधिकार होता है। ये दीर्घ काल तक निस्तब्ध रहते हैं पर जब चाहते हैं तब शरीर में प्राण का स्पंदन बढ़ाकर हृदय का धड़कना आरम्भ कर देते हैं और साधारण जीवन जीने लगते हैं । जब तक उनका प्राण खींचकर ब्रह्माण्ड में संचित किया रहता है तब तक हृदय की धड़कन बंद रहती है और शरीर मृत्युतुल्य हो जाता है, इसलिए उनको दीर्घकालीन समाधि का सुख मिलता रहता है ।

प्राण पर अधिकार प्राप्त किये बिना लंबे समय तक स्थिर समाधि नहीं लग सकती। प्राण पर अधिकार करके दीर्घकाल तक जीवन स्थिर रखना, मृत्यु को इच्छानुवर्ति बना लेना सम्भव है, एक मनुष्य दूसरे को प्राणदान दे सकता है , जैसे एक मनुष्य का रक्त दूसरे के शरीर में पहुंचाया जा सकता है, वैसे ही एक का प्राण दूसरे के शरीर में प्रवेश करके उसे जीवन एवं मनोबल दे सकता है।

अपान

अपान का स्थूल कार्य मलों का ठीक प्रकार विसर्जन करना है । देह के भीतर सदा पैदा होने वाले मल, मूत्र, पसीना, आदि विजातीय व् त्याज्य पदार्थ को अपान अनेक छिद्रों द्वारा शरीर से बाहर निकालता रहता है । यदि अपान अपनी क्रिया न करे शरीर में मल निकालने की शक्ति घट जायेगी और अपच, जुकाम आदि रोग पैदा हो जायेंगे।

इसके अतिरिक्त अपान की सूक्ष्म क्रिया जननेन्द्रिय में होती है । काम वासना का आधार इसी पर निर्भर है। मन को मथ डालनेवाली , चित्त को अधीर, व्यग्र एवं आतुर कर डालने वाली वासना, अपान के उत्तेजित हो जाने से होती है । यह यदि शिथिल हो जाये तो तरुण पुरुष भी नपुंसक हो जायेगा। संतान का सौंदर्य , स्वास्थ्य, बुद्धि, पराक्रम, स्वभाव अपान से बहुत कुछ सम्बंधित है। अपान का सहवर्ती कूर्म लघुप्राण यदि सुषुप्त अवस्था में होगा तो, शारीरिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ होने पर भी गर्भ के स्थापना कभी न हो सकेगी।

जिन स्त्री पुरुषों में अपान साम्य होता है उन्हें काम-सेवन में असाधारण आनंद आता है। रूप सौंदर्य पर नहीं , कामतुष्टि अपान की समानता पर निर्भर करती है । पुरुष में अपान और स्त्री में कूर्म प्रधान होता है दोनों के परस्पर मिलन से एक ऐसा प्राण परिवर्तन होता है , जो शारीरिक और मानसिक अभावों की पूर्ती करता है । अपान पर अधिकार की पद्धति न जानते जिन्हें हठपूर्वक ब्रह्मचर्य रखना पड़ता है वे प्रायः किन्ही रोगों से ग्रसित रहते हैं ।

आज विधुर और विधवाओं में से अधिक का स्वास्थ्य खराब देखा जाता है, और जनगणना की रिपोर्ट से पता चलता है कि गृहस्थों की अपेक्षा विधुरों की मृत्यु संख्या का अनुपात कहीं अधिक है, जिनमे अपान की समानता है , वे अकारण ही आपस में घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं । उन्हें एक दूसरे के साथ रहने में बड़ी शांति मिलती है । ऐसे मित्रों को ही प्राणसखा कहते हैं । उन्हें आपसी वियोग मर्मान्तक वियोग देता है।

समान

सामान प्राण उदर में नाभि के निचे रहता है । पाचन इसका प्रमुख कार्य है । गर्मी उष्णता एवं पित्त को समान का प्रतिक कहते हैं । शरीर में चंचलता , स्फूर्ति, उत्साह, छरहरापन, एवं चमक इसी के कारण होती है। त्वचा की चिकनाई, कोमलता, चमक में कृकल प्राण का अस्तित्व परिलक्षित होता है । खूब भुख लगना, अधिक आहार करना, जल्दी पचा लेना, सर्दी के प्रभाव से व्यथित न होना समान की विशेषता है । जिनमे यह प्राण कम होगा, वे सर्दी बर्दाश्त न कर सकेंगे, जाड़ो में उनकी देह लुंज पुंज सी हो जायेगी । कानों को उंगलियो को, पैरों को बड़ी ठण्ड लगेगी, ठन्डे जल में जाड़े के दिनों में स्नान करना उन्हें बड़ा कष्टकर लगेगा। अधिक कपडे लादे रहने पर भी ठण्ड न छूटेगी।

ऐसे लोगो का जरा से भोजन से पेट भर जाता है। गरम पदार्थ खाने की , धुप या अग्नि के निकट बैठने की इच्छा रहती है । ऐसे मनुष्य अपनी दुर्बलतअ के कारण सर्दी को बर्दाश्त नहीं कर पाते, पर गर्मी का मौसम उनकी प्रकृति के अनुकूल पड़ता है। समान की न्यूनता के कारण शरीर में उष्णता कम रहती है, उसकी पूर्ती गर्म मौसम से हो जाती है। ऐसे लोगो की नाड़ी पतली चलती है।

सामान का स्वास्थ्य से बड़ा सम्बन्ध है। इन्द्रियों की रसानुभूति समान के आधार पर घटती बढ़ती रहती है। स्वादिष्ट पदार्थ, मनोरम दृष्टि, मधुर ध्वनि, सुखद स्पर्श , सुरभित गंध, को भली प्रकार ग्रहण करने और इससे आनंदित होने की क्षमता समान प्राण वालो में होती है। जिसका समान घट जाता है वह सब प्रकार की सुखद परिस्थितियों के होते हुए भी झुंझलाया हुआ रहेगा, देह का कोई न कोई अंग बीमारी का कष्ट पाता रहेगा।

ऐसे लोगों को सन्निपात, मोतीझरा, आदि तीव्र रोग तो नहीं होते पर जुकाम , खांसी, पेट का भारीपन , सर दर्द, दांतो का हिलना, आँखों की कमजोरी , देह का टूटना, थकान जैसे मंद रोग घेरे रहेगे। एक से पीछा छूटने से पहले ही नया उत्पन्न हो जायेगा।

समान पित्त का प्रतिक है। कृकल कफ का प्रतिनिधि है। दोनों के मिलने से वात् बनता है । इन तीनों के उलझने सुलझने और घटने बढ़ने से बीमारी और तंदुरुस्ती का चक्र घूमता है। कहा जाता है कि बिमारी की जड़ पेट में है, इसका अर्थ यही है कि नाभि चक्र के निवासी समान और क्रिकल ही हमारे स्वास्थ्यके अधिपति हैं। इन पर अधिकार होने से चीरस्थायि स्वास्थ्य का स्वामित्व प्राप्त होता है ।

उदान

‘उदान’ प्राण का निवास कण्ठ है। यह श्री और समृद्धि का स्थान है। लक्ष्मी जी का केन्द्र कण्ठ- कूप की ‘स्फुटा’ ग्रन्थि को माना गया है। लक्ष्मी जी की पूजा एवं ‘स्फुटा’ के उत्तेजन से निर्मित कण्ठ में स्वर्णाभूषण धारण किये जाते हैं। ‘स्फुटों’ पर धातुओं और रत्नों का जो प्रभाव पड़ता है, उसे जानने वाले गले में रत्न, कवच, आभूषण एवं मालायें बनाकर कण्ठ में धारण करते हैं और उनके सूक्ष्म परिणामों से लाभान्वित होते हैं।

उदान के परिपूर्ण होने से मनुष्य को वे योग्यताएं, सामर्थ्य, शक्तियां, विशेषताएं, एवं प्रचुरताएं प्राप्त होती हैं, जिनके कारण सांसारिक, आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती रहती हैं। तृष्णाओं का तो अंत नहीं, उन्हें तो कुबेर भी पूरा नहीं कर सकता, पर जीवनोपयोगी कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसे उदान की सामर्थ्य से प्राप्त नहीं किया जा सकता हो। जिनकी स्फुटा ग्रंथि जाग्रत है, वे कभी भी अभावग्रस्त नहीं रह सकते, उनकी हर उचित आवश्यक्ता समय पर पूरी हो जाती है।

देवदत्त 

देवदत्त’ सूक्ष्म प्राण आध्यात्मिकता और सम्प्रदायों का स्वामी है। अष्ट सिद्धियाँ, नव निद्धियाँ देवदत्त से सम्बन्धित हैं। शाप-वरदान, दूर-दर्शन, दूर-श्रवण, अणिमा, महिमा, लघिमा आदि चमत्कारों का केन्द्र यही है।

अमीर, सम्पन्न, बड़े आदमी, व्यापारी, धनी, लक्ष्मीपति बनना, वैसे घर में जन्म माना, वैसी आकस्मिक सहायताये प्राप्त होना, वैसे अवसर, सुझाव या मित्र मिल जाना उदान-प्राण के शक्तिशाली होने पर निर्भर हैं। जब यह प्राण निर्बल हो जाता है तो लक्ष्मी विदा होते देर नहीं लगती। ऐसे गलत कदम उठ जाते हैं, ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जिनके कारण घाटे पर घाटा होने लगता है, चोट पर चोट लगती है और मनुष्य कुछ दिनों में निर्धन एवं दीन-हीन बन जाता है।

जब तक स्फुटा जागृत रहती है, तब तक बड़ी-बड़ी हानि होने पर भी स्थायी रूप से दरिद्रता नहीं आ सकती। कारण यह है कि स्फुटा में उदान प्राण के सम्पर्क से एक ऐसी चैतन्य स्कुरणा उत्पन्न होती है, जो अदृश्य लोक में छिपे हुए भविष्य का परिचय पाती रहती है। उसे अज्ञात रूप से अनायास ही ऐसा आभास होता रहता है कि यह करना ठीक है और यह करना अनिष्टकारक होगा। एक अज्ञात शक्ति उसका पथ प्रदर्शन करती सी मालूम होती है। वह खतरों से बचाती है, आगे बढ़ने का मार्ग बताती है और कठिन परिस्थितियों में सहारा देती है, जिससे कि डूबता हुआ बेड़ा पार हो जाता है। उदान द्वारा चैतन्य स्फुटा को शरीर-वासिनी लक्ष्मी कहा जाता है।

जिसका कण्ठ-कूप का ‘देवदत्त’ प्रबुद्ध होता है,’ ऐसा पुरुष महा चमत्कारी, परम सिद्ध पुरुष बन जाता है। वह चाहे तो प्राण बल से अद्भुत उथल-पुथल उत्पन्न कर सकता है।

व्यान

‘व्यान’ का स्थान मस्तिष्क का मध्य भाग है। यह चार अन्य प्राणों का नियंत्रण करता है। दोनों कानों के बीच एक रेखा खींची जाय और दूसरी रेखा भूमध्य भाग से लेकर सिर के पीछे तक खींची जाय तो दोनों जहाँ मिलेंगी, वह स्थान त्रिकुटी कहा जायेगा। यही ‘ध्यान’ का स्थान माना जाता है। इसका सहायक ‘धनञ्जय’ है। व्यान को कृष्ण, धनञ्जय को अर्जुन कहते हैं। इसी त्रिकुटी में, युद्धस्थली के मध्य भाग में कृष्णार्जुन सम्वाद रूपी गीता का आविर्भाव होता है। मध्य मस्तक में शतदल कमल में अवस्थिति जिस अमृतकलश का योगशास्त्रों में वर्णन है, उसे ध्यान और धनञ्जय का प्रसाद ही समझना चाहिये।

‘व्यान’ के प्रबुद्ध होने से ऋतम्भरा प्रज्ञा मिलती है। ऋतम्भरा प्रज्ञा उस उच्च विचारधारा को कहते हैं, जो जीव को आत्मकल्याण की ओर ले जाती है। सत्कर्म शुभ-संकल्प, सद्वृत्ति आदि दैवी गुण कर्म स्वभावों का प्रकाश व्यान द्वारा ही होता है। आत्म-साक्षात्कार ईश्वर-दर्शन, ब्रह्म-प्राप्ति, दिव्य-दृष्टि एवं समाधि का केन्द्र व्यान है। व्यान को गरुड़ कहा गया है। भगवान का वाहन गरुड़ है। जिसका व्यान जागृत हो गया उसके मानस में परमात्मा का प्रत्यक्ष विकास परिलक्षित होने लगता है।

मस्तिष्क में अनेक शक्तियों हैं, जिनके कारण मनुष्य अपनी सर्वोपरि प्रधानता सिद्ध करता है। संसार में ऐसे कितने ही महापुरुष हुए हैं, जिनकी अद्भुत मानसिक योग्यता एवं प्रतिभा ने लोगों को हैरत में डाल दिया है। यह धनञ्जय प्राण के विकास का चमत्कार है। मस्तिष्क में अनेक शक्तियों का निवास है। व्यवस्था-शक्ति, ग्रहण-शक्ति, निर्णय-शक्ति, रचना-शक्ति, आमोद-शक्ति, उपक्रान्ति-शक्ति, अनुवर्तन-शक्ति आदि अगणित शक्तियाँ मस्तिष्क में भरी पड़ी हैं।

सभी प्रकार की भली-बुरी तुच्छ-महान, शक्तियों का भण्डार मस्तिष्क है। इस आधार की सुव्यवस्था एवं अव्यवस्था का आधार धनञ्जय प्राण है। यदि उसमें कुछ गड़बड़ी हो तो मनुष्य में अनेक मानसिक विभूतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। ऐसे लोग मूर्ख, मन्दबुद्धि चिंतित, दुःखी एवं उलझनों में उलझे रहते हैं। किसी व्यक्ति का पूर्ण मस्तिष्कीय विकास तभी हो सकता है जब उसका व्यान ठीक हो और उसका मंत्री ‘धनञ्जय’ जागृत होकर काम करे।

दस प्राणों को सुसुप्त दशा से उठाकर जागृत करने, उसमें उत्पन्न हुई कुप्रवृत्तियों का निवारण करने, प्राण शक्ति पर परिपूर्ण अधिकार एवं आत्मिक जीवन को सुसम्पन्न बनाने के लिए प्राण-विद्या’ का जानना आवश्यक है। जो इस विद्या को जानता है, उसको प्राण सम्बन्धी न्यूनता एवं विकृति के कारण उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ दुःख नहीं देती।

 

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

प्राणाकर्षण प्राणायाम

(1) प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख, पालथी मार कर आसन पर बैठिए । दोनों हाथों को घुटनों पर रखिए। मेरुदण्ड, सीधा रखिए। नेत्र बन्द कर लीजिए। ध्यान कीजिए कि अखिल आकाश में तेज और शक्ति से ओत-प्रोत प्राण-तत्त्व व्याप्त हो रहा हैं। गरम भाप के, सूर्य प्रकाश में चमकते हुए, बादलों जैसी शकल के प्राण का उफन हमारे चारों ओर उमड़ता चला आ रहा है। और उस प्राण-उफन के बीच हम निश्चिन्त, शान्तचित्त एवं प्रसन्न मुद्रा में बैठे हुए हैं।

(2)नासिका के दोनों छिद्रों से धीरे-धीरे साँस खींचना आरंभ कीजिए और भावना कीजिए कि प्राणतत्त्व के उफनते हुए बादलों को हम अपनी साँस द्वारा भीतर खींच रहे हैं। जिस प्रकार पक्षी अपने घोंसले में, साँप अपने बिल में प्रवेश करता हैं उसी प्रकार वह अपने चारों ओर बिखरा हुआ प्राण-प्रवाह हमारी नासिका द्वारा साँस के साथ शरीर के भीतर प्रवेश करता हैं और मस्तिष्क छाती, हृदय, पेट, आँतों से लेकर समस्त अंगों में प्रवेश कर जाता हैं।

(3)जब साँस पूरी खिंच जाय तो उसे भीतर रोकिए और भावना कीजिए कि −जो प्राणतत्त्व खींचा गया हैं उसे हमारे भीतरी अंग प्रत्यंग सोख रहे हैं। जिस प्रकार मिट्टी पर पानी डाला जाय तो वह उसे सोख जाता है, उसी प्रकार अपने अंग सूखी मिट्टी के समान हैं और जल रूप इस खींचे हुए प्राण को सोख कर अपने अन्दर सदा के लिए धारण कर रहें हैं। साथ ही प्राणतत्त्व में संमिश्रित चैतन्य, तेज, बल, उत्साह, साहस, धैर्य, पराक्रम, सरीखे अनेक तत्त्व हमारे अंग-अंग में स्थिर हो रहे हैं।

(4) जितनी देर साँस आसानी से रोकी जा सके उतनी देर रोकने के बाद धीरे-धीरे साँस बाहर निकालिए। साथ ही भावना कीजिए कि प्राण वायु का सारतत्त्व हमारे अंग-प्रत्यंगों के द्वारा खींच लिए जाने के बाद अब वैसा ही निकम्पा वायु बाहर निकाला जा रहा है जैसा कि मक्खन निकाल लेने के बाद निस्सार दूध हटा दिया जाता है। शरीर और मन में जो विकार थे वे सब इस निकलती हुई साँस के साथ घुल गये हैं और काले धुँऐ के समान अनेक दोषों को लेकर वह बाहर निकल रहे हैं।

(5) पूरी साँस बाहर निकल जाने के बाद कुछ देर साँस रोकिए अर्थात् बिना साँस के रहिए और भावना कीजिए कि अन्दर के दोष बाहर निकाले गये थे उनको वापिस न लौटने देने की दृष्टि से दरवाजा बन्द कर दिया गया है और वे बहिष्कृत होकर हमसे बहुत दूर उड़ें जा रहे हैं। इस प्रकार पाँच अंगों में विभाजित इस प्राणाकर्षण प्राणायाम को नित्य ही जप से पूर्व करना चाहिए। आरंभ 5 प्राणायामों से किया जाय । अर्थात् उपरोक्त क्रिया पाँच बार दुहराई जाय। इसके बाद हर महीने एक प्राणायाम बढ़ाया जा सकता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक वर्ष में आधा घंटा तक पहुँचा देनी चाहिए। प्रातःकाल जप से पर्व तो यह प्राणाकर्षण प्राणायाम करना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त भी कोई सुविधा का शान्त, एकान्त अवसर मिलता हो तो उस में भी इसे किया जा सकता हैं।

 

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

प्राणमय कोश की साधना – 3

प्राणाकर्षण  की सुगम क्रियाएँ – 1

 

प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर साधना के लिए किसी शांतिदायक स्थान पर आसन बिछाकर बैठिये, दोनों हाथो को घुटनो पर रखिये, मेरुदंड सीधा रहे, नेत्र बंद कर लीजिये।

फेफड़ों में भरी हुई हवा बाहर निकाल दीजिये, अब धीरे धीरे नासिका द्वारा साँस लेना आरम्भ कीजिये। जीतनी अधिक मात्रा में भर सके फेफड़ों में हवा भर लीजिये। अब कुछ देर उसे भीतर ही रोके रहिये। इसके पश्चात् साँस को बाहर धीरे धीरे नासिका द्वारा निकालना आरम्भ कीजिये। हवा को जितना अधिक खाली कर सकें कीजिये। अब कुछ देर साँस को बाहर ही रोक दीजिये अर्थात बिना सांस के ही रहिये। इसके बाद पूर्ववत् वायु को खींचना आरम्भ कीजिये ।।यह एक प्राणायाम हुआ ।

साँस निकलने को रेचक, खींचने को पूरक, और रोके रहने को कुम्भक कहते हैं। कुम्भक के दो भेद हैं । सांस को भीतर रोके रहना अंतः कुम्भक और खाली करके बिना साँस रहना बाह्य कुम्भक कहलाता है। रेचक और पूरक में समय बराबर लग्न चाहिए पर कुम्भक में उसका आधा समय ही पर्याप्त है ।

पूरक करते समय भावना करनी चाहिए कि मैं जन शून्य लोक में अकेला बैठा हूँ और मेरे चारो ओर विद्युत् जैसी चैतन्य जीवनी शक्ति का समुद्र लहरे ले रहा है। साँस द्वारा वायु के साथ साथ प्राण शक्ति को मैं अपने अंदर खिंच रहा हूँ।

अंतः कुम्भक करते समय भावना करनी चाहिए कि उस चैतन्य प्राण शक्ति मैं अपने भीतर भरे हूँ। समस्त नस नाड़ियो में, अंग प्रत्यंग में वह शक्ति स्थिर हो रही है। उसे सोखकर देह का रोम रोम चैतन्य, प्रफुल्लित, सतेज एवं परिपुष्ट हो रहा है।

रेचक करते समय भावना करनी चाहिये कि शरीर में संचित मल, रक्त में मिले विष, मन में धंसे हुए विकार साँस छोड़ने पर वायु के साथ साथ बाहर निकाले जा रहे हैं ।

बाह्य कुम्भक करते समय भावना करनी चाहिए कि अंदर के दोष साँस के द्वारा बाहर निकलकर भीतर का दरवाजा बंद कर दिया गया है, ताकि वे विकार वापस न लौटने पाएं।

इन भावनाओ के साथ प्राणकर्षण प्राणायाम करना चाहिए। आरम्भ में पञ्च प्राणायाम करे फिर क्रमशः सुविधानुसार बढ़ाते जाएँ।

Pranayama

Pranayama

प्राणाकर्षण की अन्य सुगम क्रियाएँ

कहीं एकांत में जाओ। समतल भूमि पर नरम बिछौना बिछाकर पीठ के बल लेट जाओ, मुंह ऊपर की ओर रहे। पैर कमर छाती सर सब एक सिध में रहें । दोनों हाथ सूर्य चक्र पर (आमाशय का वह स्थान जहाँ पसलियां और पेट मिलते हैं ) रहें। मुंह बंद रखो। शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दो, मानो वह कोई निर्जीव बस्तु है और उससे तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं हैं। कुछ देर शिथिलता की भावना मारने पर शरीर बिलकुल ढीला पड़ जायेगा। अब धीरे धीरे नाक से साँस खींचना आरम्भ करो और दृढ शक्ति के साथ भावना करो कि विश्वव्यापी महान प्राण भण्डार में से मैं स्वच्छ प्राण साँस के साथ खिंच रहा हूँ और वह प्राण मेरे रक्त प्रवाह तथा समस्त नाड़ी तंतुओ में प्रवाहित होता हुआ सूर्य चक्र में इकठ्ठा हो रहा है। इस भावना को कल्पना लोक में इतनी दृढ़ता के साथ उतारो कि प्राण शक्ति की बिजली जैसी किरणें नासिका द्वारा देह में घूमती हुई चित्रवत दिखने लगें तथा उसमे प्राण प्रवाह बहता हुआ आये। भावना की जीतनी अधिकता होगी उतनी ही अधिक मात्रा में तुम प्राण खिंच सकोगे ।

फेफड़ों को वायु से अच्छी तरह भर लो और पांच से दस सेकेण्ड तक उसे रोके रहो। आरम्भ में पांच सेकेण्ड काफी हैं, पश्चात अभ्यास बढ़ने पर दस सेकेण्ड तक रोक सकते हैं । साँस के रोकने के समय अपने अंदर प्रचुर परिमाण में प्राण भरा हुआ है, यह अनुभव करना चाहिए । अब वायु को धीरे धीरे बाहर निकालो । निकालते समय ऐसा अनुभव करो कि शरीर के  सारे दोष, रोग और विष इनके द्वारा निकाल बाहर किये जा रहे हैं । दस सेकेण्ड तक बिना हवा के रहो और पूर्ववत् प्राणकर्षण प्राणायाम करना आरम्भ कर दो। स्मरण रखो कि प्राणाकर्षण का मूलतत्व साँस खींचने छोड़ने में नहीं वरन् आकर्षण की उस भावना में है, जिसके अनुसार अपने शरीर में प्राण का प्रवेश होता हुआ चित्रवत दिखाई देने लगता है।

इस प्रकार श्वास – प्रश्वास की क्रियाएँ दस मिनट से लेकर धीरे धीरे आधे घंटे तक बढ़ा लेनी चाहिये । श्वास द्वारा खींचा हुआ प्राण सूर्य चक्र में जमा होता जा रहा है , इसकी विशेष रूप से भावना करो । मुंह द्वारा सांस छोड़ते समय आकर्षित प्राण को छोड़ने की भी कल्पना करने लगें , तो यह सारि क्रिया व्यर्थ जायेगी और कुछ लाभ न मिलेगा ।

ठीक तरह से प्राणकर्षण करने पर सूर्य चक्र जाग्रत होने लगता है । ऐसा प्रतीत होता है कि पसलियों के जोड़ और आमाशय के स्थान पर जो गड्ढा है , वह सूर्य के सामान एक छोटा सा प्रकाश बिंदु मानव नेत्रों से दिख रहा है। यह गोला आरम्भ में छोटा , थोड़े प्रकाश का और धुंधला मालुम देता है, किन्तु जैसे जैसे अभ्यास बढ़ने लगता है , वैसे वैसे साफ़, स्वच्छ, बड़ा और प्रकाशवान होता है। जिनका अभ्यास बढ़ा- चढ़ा है उन्हें आँख बंद करते ही अपना सूर्य चक्र साक्षात् सूर्य की तरह तेजपूर्ण दिखाई देने आगत है। वह प्रकाशित तत्त्व सचमुच प्राण शक्ति है। इसके शक्ति से कठिन कार्यों में अद्भुत सफलता प्राप्त होगी।

 

अभ्यास पूरा करके उठ बैठो । तुम्हे मालूम पड़ेगा कि रक्त का दौरा तेजी से हो रहा है और सारे शरीर में एक बिजली से सी दौड़ रही है। अभ्यास के उपरान्त कुछ देर शांतिमय स्थान में बैठना चाहिए । अभ्यास से उठकर एक दम किसी काम में जुट जाना, स्नान, भोजन, मैथुन करना निषिद्ध है।

 

ऊपर सर्वसाधारण के उपयोग की श्वास- प्रश्वास क्रियाओं का वर्णन हो चूका है। इसके उपयोग से गायत्री साधकों की आंतरिक दुर्बलता दूर होती है और प्राणवान होने के लक्षण प्रकट होने लगते हैं , प्राणमय कोश की भूमिका को पार करते हुए दस प्राणों को संशोधित करना पड़ता है।

 

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

प्राणमय कोश की साधना – 2

प्राणायाम (Pranayam)

श्वास को खींचने उसे अंदर रोके रखने और बाहर निकालने की एक विशेष क्रियापद्धति है , इस विधान के अनुसार प्राण को उसी प्रकार अंदर भरा जाता है जैसे साईकिल के पम्प से ट्यूब में हवा भरी जाती है। यह पम्प इस प्रकार का बना होता है कि हवा को भरता है पर वापस नहीं खींचता । प्राणायाम की व्यवस्था भी इसी प्रकार की है । साधारण श्वास प्रश्वास प्रक्रिया में वायु के साथ वह प्राण भी इसी प्रकार आता जाता रहता है जैसे रास्ते पर मुसाफिर चलते फिरते रहते हैं। किन्तु प्राणायाम विधि के अनुसार जब श्वास प्रश्वास क्रिया होती है तो वायु में से प्राण खींचकर खासतौर से उसे शरीर में स्थापित किया जाता है जैसे कि धर्मशाला में यात्री को व्यवस्थापूर्वक टिकाया जाता है ।

भारतीय योगशास्त्रों में षट्चक्र में सूर्यचक्र को बहुत अधिक महत्त्व दिया गया है । अब पाश्चात्य विद्वानों ने भी सूर्य ग्रंथि को सूक्ष्म तंतुओं का केंद्र स्वीकार किया है और माना है कि मानव शरीर में प्रतिक्षण होती रहने वाली क्रिया प्रणाली का संचालन इसी के द्वारा होता है । कुछ विद्वानों ने इसे पेट का मस्तिष्क नाम दिया है । यह सूर्यअ चक्र या सोलर प्लेक्सस आमाशय जे ऊपर हृदय की धुक धुक के पीछे मेरुदंड के दोनों ओर स्थित है । यह एक प्रकार की सफ़ेद और भूरि गद्दी से बना हुआ है । पाश्चात्य वैज्ञानिक शरीर की आंतरिक क्रिया विधि पर इसका अधिकार मानते हैं और कहते हैं कि भीतरी अंगों की उन्नति अवनति का आधार यहि केंद्र है। किन्तु सच बात यह है कि खोज अभी अपूर्ण है। सूर्य चक्र का कार्य और महत्त्व उससे अनेक गुना अधिक है जितना वे लोग मानते हैं । ऐसा देखा गया है कि उस केंद्र पर यदि जरा कड़ी चोट लग जाये तो मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो जाती है।  योगशास्त्र इस केंद्र को प्राणकोश मानता है और कहता है कि वहीँ से निकलकर एक प्रकार का मानवी विद्युत् प्रवाह सम्पूर्ण नाड़ियो में प्रवाहित होता है । ओजस शक्ति इस संस्थान में रहती है।

Solar Plexus

Solar Plexus

प्राणायाम द्वारा सूर्य चक्र की एक प्रकार की हलकी हलकी मालीश होती है जिससे उसमे गर्मी तेजी और उत्तेजना का संचालन होता है और उसकी क्रियाशीलता बढ़ती है। प्राणायाम से फुफ्फुसों में वायु भरती है और वे फुलते हैं और यह फूलकर सूर्यचक्र की परिधि में स्पर्श करता है।

बार बार स्पर्श करने से जिस प्रकार काम सेवन वाले अंगो में उत्तेजना उत्पन्न होती है उसी प्रकार प्राणायाम द्वारा फुफ्फुस से सूर्य चक्र का स्पर्श होना वहां एक सनसनी उत्तेजना और हलचल पैदा करता है। यह उत्तेजना व्यर्थ नहीं जाती वरन सम्बंधित सारे अंग प्रत्यंगों को जीवन और बल प्रदान करती है, जिससे शारीरिक और मानसिक उन्नतियों का द्वार खुल जाता है ।

मेरुदंड के दाहिने, बाएं दोनों ओर नाड़ी गुच्छकों की दो श्रृंखलाएं चलती हैं । ये गुच्छक आपस में सम्बंधित हैं और इन्हीं में सर, गले, छाती, पेट आदि के गुच्छक भी आकर शामिल हो गए हैं । अन्य अनेक नाड़ी तंतुओं का भी वहां जमघट है । इनका प्रथम विभागजिसे मस्तिष्क मेरु विभाग कहते हैं शरीर ज्ञान तंतुओं से घनीभूत हो रहा है। इसी संस्थान से असंख्य बहुत ही बारीक भूरे तंतु निकालकर रुधिर नाड़ियों में फ़ैल गए हैं और अपने अंदर रहने वाली विद्युत् शक्ति से भीतरी शारीरिक अवयवों को संचालित किये रहते हैं ।

ऊपर बताया जा चूका है कि मेरुदंड के दायें बाएं नाड़ी गुच्छको की दो पृथक श्रृंखलाएँ चलती है , इन्हीं को योग में इडा और पिंगला कहा गया है। रुधिर संचार, श्वास क्रिया, पाचन आदि प्रमुख कार्यों को सुसंचालित रखने की जिम्मेदारी उपरोक्त नाड़ी गुच्छकों के ऊपर प्रधान रूप से है । प्राणायाम साधना में इन इडा पिंगला नाड़ियो को नियत विधि के अनुसार बलवान बनाया जाता है , जिससे उनसे सम्बंधित शरीर की सहानुभावी क्रिया के विकार दूर होकर आनंदमयी स्वस्थता प्राप्त हो सके ।

अत्यंत प्राचीन काल से अध्यात्मवेत्ता पुरुष प्राणायाम के महत्त्व और उनके लाभों को अनुभव करते रहे हैं । तदनुसार समस्त भू- मंडल में योगी अपनी विधि से इन क्रियाओ को करते रहे हैं । महापुरुष ईसामसीह अपने शिष्यों सहित एक पर्वत पर चढ़कर ईश्वर प्रार्थना  किया करते थे । कहा जाता है कि इस ऊँची चढ़ाई में आध्यात्मिक श्वास- क्रियाओं का रहस्य छिपा हुआ था ।

बौद्ध धर्म में जजन नामक प्राणायाम बहुत काल से चलता आया है। प्रसिद्ध जापानी पुरोहित हकुइन जेशि ने प्राणायाम का खूब विस्तार किया था। यूनान में प्लेटो से भी बहुत पहले इस विज्ञानं की जानकारी का पता चलता है। अन्यान्य देशों में भी किसी न किसी रूप में इस विद्या के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं ।

योगदर्शन साधनापाद के सूत्र 52, 54 में बताया गया है कि प्राणायाम से अविद्या का अन्धकार दूर होकर ज्ञान की ज्योति प्रकट होती और मन एकाग्र होने लगता है। ऐसी गाथाएं भी सुनी जाती हैं कि प्राण को वश में करके योगी लोग मृत्यु को जीत लेते हैं और जब तक चाहें वे जीवित रह सकते हैं । प्राण शक्ति से अपने और दूसरे के रोगों को नष्ट करने का एक अलग विज्ञान  , अनेक प्रकार के प्राणायामों से होने वाले लाभ सुने और देखे जाते हैं। यह लाभ कभी कभी इतने विचित्र होते हैं कि उन पर आश्चर्य करना पड़ता है।

इन पंक्तियों में उन अद्भुत और आश्चर्यजनक घटनाओं की चर्चा न करके इतना कहना पर्याप्त होगा कि प्राणायाम से शरीर की सूक्ष्म क्रिया पद्धति के ऊपर अदृश्य रूप से ऐसे विज्ञानं सम्मत प्रभाव पड़ते हैं , जिनके कारण रक्त संचार, नाड़ी सञ्चालन पाचन क्रिया, स्नायविक दृढ़ता, प्रगाढ़ निद्रा, स्फूर्ति एवं मानसिक विकास के चिह्न स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं एवं स्वस्थता, बलशीलता , प्रसनता, उत्साह तथा परिश्रम की योग्यता बढ़ती है।

आत्मोन्नति, चित्त की एकाग्रता, स्थिर दृढ़ता आदि मानसिक गुणों की मात्रा में प्राण साधना के साथ साथ ही वृद्धि हो जाती है । इन लाभों पर विचार किया जाये तो प्रतीत होता है कि प्राणायाम आत्मोन्नति की महत्वपूर्ण साधना है । प्राण तत्व का वायु से विशेष सम्बन्ध है । पाश्चात्य वैज्ञानिक तो प्राण को वायु का ही एक सूक्ष्म भेद मानते हैं । सांस को ठीक तरह से लेने न लेने पर प्राण की मात्रा  का घटना बढ़ना निर्भर रहता है। इसलिए कम से कम सांस लेने के सही तरीके से प्रत्येक बाल वृद्ध को परिचित होना चाहिए।

हमें गहरी और पूरी सांस लेनी चाहिए, जिससे वायु फेफड़े के हर भाग में जाकर सम्पूर्ण वायु मंदिरों में रक्त की सफाई कर सके । अधूरी और उथली सांस लेने से कुछ थोड़े से वायु मंदिरो की सफाई हो पाती है ; क्योंकि उथली सांस का दबाब इतना नहीं होता कि वह हर एक कोष्ठ तक पहुँच सके । जब हवा वहां तक पहुंचेगी ही नहीं तो सफाई किस प्रकार होगी ? सांस का संपर्क होने पर रक्त की अशुद्धता कार्बोनिक एसिड गैस बाहर निकल जाती है और सांस का प्राण आक्सीजन में घुल जाता है ।

यह प्राण शक्ति उस शुद्ध रक्त के दूसरे दौरे के साथ शरीर के अंग प्रत्यंगों में पहुंचकर उन्हें ताजगी और स्फूर्ति प्रदान करती है। शुद्ध रुधिर में एक चौथाई भाग ऑक्सीजन का होता है । यदि इसमें न्यूनता हो जाये  तो उसका प्रभाव पाचन क्रिया पर अनिवार्य रूप से पड़ता है। ऐसे व्यक्तियों की जठराग्नि मंद होने लगती है।

Solar Plexus Center Attributes

Solar Plexus Center Attributes

इन सब क्रियाओ पर विचार करने से यह स्पष्ट होता है कि हमें पूरी गहरी साँस लेने की आवश्यकता है। जिससे रक्त में पर्याप्त ऑक्सीजन मिलनजाये, अंग प्रत्यंग में ताजगी एवं स्फूर्ति पहुँचती रहे और पाचन शक्ति में निर्बलता न आने पाये। जठराग्नि मंद होने से अन्य अंगो में शिथिलता आने लगती है और वे अपने को अधूरा व् दोषपूर्ण बनाते हैं । यही क्रम यदि कुछ समय जारी रहे , तो जीवन यात्रा में नाना प्रकार की विघ्न बाधाएं उपस्थित हो सकती हैं और विविध भाँती के रोगों का सामना करना पड़ता है ।

अधूरी सांस लेने वाले के फेफड़े का बहुत सा भाग निकम्मा पड़ा रहता है। जिन मकानों की सफाई नहीं होती उनमे गन्दगी , मकड़ी, मच्छर , छिपकली, कीड़े मकोड़े आदि का जमघट होने लगता है। इसी तरह फेफड़े के जिन वायु कोष्ठों में सांस की वायु नहीं पहुँचती उनमे क्षय, खांसी, जुकाम, उरक्षत, कफ,दमा, आदिनके रोग किट जड़ जमा लेते हैं। धीरे धीरे वहां वे निर्बाध गति से पलटे रहते हैं और भीतर ही भीतर अपना इतना आधिपत्य जमा लेते हैं कि फिर उनका निकाल बाहर करना कठिन या असम्भव हो जाता है।

प्राणायाम विज्ञानं का सबसे पहला और आरंभिक पाठ यही है कि हमें पूरी तरह गहरी साँस लेनी चाहिए । ऐसी आदत डालने का प्रयत्न करना चाहिए कि सदैव इस प्रकार सांस ली जाए कि वायु से पुरे फेफड़े भर जाएँ। यह कार्य झटके से  या उतावाली में नहीं होना चाहिए। धीरे धीरे इस प्रकार पूरी साँस खींचनी चाहिए कि छाती भरपूर चौड़ी हो जाये और फिर उसी क्रम में धीरे धीरे वायु को बाहर निकाल देना चाहिए ।

यही रीति फेफड़ो को स्वस्थ रखने वाली है, रक्त को शुद्ध करने वाली, शरीर के अंग प्रत्यंग में चैतन्यता देने वाली, पाचन शक्ति ठीक बनाये रखने वाली है, इसलिये आरोग्य और दीर्घ जीवन देने वाली भी है।

पूरी साँस लेने का अभ्यास डालने से छाती की चौड़ाई बढ़ती है, फेफड़ों की मजबूती और वजन में वृद्धि होती है, हृदय की कमजोरी में सुधार होकर रक्तसंचार की क्रिया में चैतन्यता दिखाई देने लगती है। पाठकों का श्वास विज्ञानं के इस तथ्य को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए और अविलंब पूरी व् गहरी साँस लेने की आदत डालने का अभ्यास आरम्भ कर देना चाहिए । कुछ दिन श्वास क्रिया पर ध्यान रखने से भूल सुधरती रहने से यह आदत भली प्रकार पद जाती है।

प्राणायाम विज्ञान की दूसरी शिक्षा नाक से सांस लेना है । यद्यपि मुंह से भी साँस ली जा सकती है पर वह इतनी उपयोगी कदापि नहीं हो सकती जीतनी कि नाक से साँस लेने पर होती है। एक बार एक जंगी जहाज के यात्रियों में चेचक बड़े उग्र रूप से फैली। मृतको के बारे में डॉक्टरों की रिपोर्ट थी कि ये सभी मुँह से साँस लेते थे। उस जहाज में एक भी ऐसा आदमी नहीं मरा जिसे नाक से साँस लेने की आदत थी। जुकाम और सर्दी के रोगों के बारे में भी डाक्टरी जाँच का यही निष्कर्ष है कि मुह खोलकर साँस लेने से इसका प्रकोप विशेष रूप से होता है। और भी अनेक छोटे बड़े रोग इस आदत के कारन होते देखे गए हैं ।

नाक से फेफड़ो तक जो हवा पहुचने वाली नली है उसकी रचना इस प्रकार हुई है कि वह वायु को उचित रूप से संशोधन परिमार्जन करके भीतर पहुचाये। नासिका छिद्रो में छोटे छोटे बाल होते हैं । यह एक प्रकार की चलनी है जिसमे धूल व् गन्दगी के कण अटके रह जाते हैं और छनि हुई वायु भीतर जाती है । जब आप नासिका के छिद्रों में उंगली डालकर उसकी सफाई करते हैं तो उनमे से मेल निकलता है। यही मैल कचरा है जो वायु के छानने के बाद बचा रहता है।

Benefits of Pranayama

Benefits of Pranayama

नासिका में एक प्रकार का तरल पदार्थ स्रावित होता रहता है , बालो में अटकने के सिवाय जो कचरा बचा रहता है वह इस स्राव में चिपक जाता है। वायु का इतना संशोधन नासिका छिद्रो में हो जाने में उपरांत वह आगे चलती है। श्वास नली जो फेफड़ो तक मस्तिष्क में होती हुई गयी है काफी लंबी है। इतनी लम्बाई में यात्रा करती हुई वायु का तापमान सह्य हो जाता है । यदि ठंडी हुई तो गर्म हो जाती है । इस प्रकार फेफड़ो तक पहुँचते पहुचते वह सब प्रकार संशोधित हो जाती है। किन्तु यदि मुंह से साँस लें तो परिणाम बिल्कुल दूसरी प्रकार का हो जाता है।

मुंह में नासिक की तरह बाल नही होते जो वायु को छाने, दूसरे मुंह का छिद्र इतना बड़ा है कि उसमे वायु गर्द गुबार बिना रुकावट के चल सकता है । तीसरे मुंह से फेफड़ो की दुरी बहुत कम है, इसलिए वायु की सर्दी गर्मी में भी विशेष परिवर्तन नहीं होने पाता है। इस प्रकार बिना छनी गर्द गुबार युक्त सर्द गर्म हवा मुंह के द्वारा जब फेफड़ो में पहुचती है तो उन्हें हानि पंहुचती है और बीमारियो की उत्पत्ति करती है। देखा गया है जो लोग रात को मुंह से साँस लेते हैं सुबह उनका मुख सुखा, कड़वा और बदबूदार होता है। रोगियो को यह लत हो तो उनको स्वस्थ होने में अनावश्यक देरी हो जाती है।

प्राणायाम के अभ्यासियों को योगियों की यह कड़ी ताकीद होती है कि वे सदा नाक से सांस लिया करें। यदि नासिका भाग में कुछ रुकावट हो जिसके कारण मुंह से साँस लेने के लिए बाध्य होना पड़ता है तो नासिका रंध्रों की सफाई कर लेनी चाहिए।

 

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  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

प्राणमय कोश की साधना – 1

प्राणशक्ति का महत्व

‘प्राण’ शक्ति एवँ सामर्थ्य का प्रतीक है | मानव शरीर के बीच जो अंतर् पाया जाता है , वह बहुत साधारण है | एक मनुष्य जितना लंबा मोटा , भारी है दूसरा भी उससे थोड़ा-बहुत ही न्यूनाधिक होगा परन्तु मनुष्य की सामाजिक शक्ति के बीच जो ज़मीन आसमान का अंतर् पाया जाता है उसका कारण उसकी आतंरिक शक्ति है |

विद्या , चतुराई, अनुभव , दूरदर्शिता , साहस , लगन , शौर्य , जीवनी शक्ति ओज , पुष्टि , पराक्रम पुरुषार्थ , महानता आदि नामों से इस आंतरिक शक्ति का परिचय मिलता है | आध्यात्मिक भाषा मे इसे प्राण-शक्ति कहते हैं | प्राण नेत्रों मे होकर चमकता है , चेहरे पर बिखरता फिरता है , हाव-भाव मे उसकी तरंगे बहती हैं | प्राण की गंध मे एक ऐसी विलक्षण मोहकता होती है जो दूसरों को विभोर कर देती है | प्राणवान स्त्री -पुरुष मन को ऐसे भाते हैं कि उन्हें छोड़ने को जी नहीं चाहता |

प्राण वाणी मे घुला रहता है उसे सुन कर सुनने वालों की मानसिक दीवारे हिल जाती हैं | मौत के दाँत उखाड़ने के लिए जान हथेली पर रखकर जब मनुष्य चलता है तो उसके प्राण शक्ति ही ढाल तलवार होती है | चारो ओर निराशाजनक घनघोर अन्धकार छाये होने पर भी प्राण शक्ति आशा की प्रकाश रेखा बनकर चमकती है | बालू मे तेल निकालने की ,मरुभूमि मे उपवन लगाने की , असंभव को संभव बनाने की , राइ को पर्वत करने की सामर्थ्य केवल प्राणवानों मे ही होती है | जिसमे स्वल्प प्राण है उसे जीवित मृतक कहा जाता है | शरीर से हाथी के समान स्थूल होने पर भी उसे पराधीन ,परमुखापेक्षी ही रहना पड़ता है | वह अपनी कठिनाइयों का दोष दूसरों पर थोपकर किसी प्रकार मन को संतोष देता है | उज्जवल भविष्य की आशा के लिए वह अपनी सामर्थ्य पर विश्वास नहीं करता | किसी सबल व्यक्ति की , नेता की , अफसर की , धनी की , सिद्ध पुरुष की , देवी-देवताओं की सहायता ही उसकी आशाओं का केंद्र होती है | ऐसे लोग सदा ही अपने दुर्भाग्य का रोना रोते हैं |

pranmay-kosh

प्राण द्वारा ही यह श्रद्धा , निष्ठा , दृढ़ता , एकाग्रता और भावना प्राप्त होती है जो भव बंधनों को काटकर आत्मा को परमात्मा से मिलाती है , ‘ मुक्ति को परम पुरुषार्थ माना गया है ‘| संसार के अन्य सुख साधनों को प्राप्त करने के लिए जितने विवेक , प्रयत्न और पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है , मुक्ति के लिए उससे कम नहीं वरण अधिक की ही आवश्यकता है |मुक्ति विजय का उपहार है , जिसे साहसी वीर ही प्राप्त करते हैं | भगवान अपनी ओर ना किसी को बंधन देते हैं ना मुक्ति | दूसरा न कोई स्वर्ग ले जा सकता है ना नर्क मे , हम स्वयं अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर जिस दिशा मे चलें उसी लक्ष्य पर जा पहुचते हैं |

उपनिषद का वचन है कि ” नायमात्मा बलहीनेन लभ्य ” व आत्मा बल्हीनों को प्राप्त नहीं होती | निस्तेज व्यक्ति अपने घरवालों पड़ोसियों , रिश्तेदारों , मित्रों को प्रभावित नहीं कर सकते तो भला परमात्मा पर क्या प्रभाव पड़ेगा | तेजस्वी व्यक्ति ही आत्मा-लाभ कर सकते हैं इसलिए प्राण संचय के लिए योग शास्त्र मे अत्यधिक बल दिया गया है | प्राणायाम की महिमा से सारा आध्यात्म शास्त्र भरा पड़ा है |

जैसे सर्वत्र ईश्वर की महामहिमामयी गायत्री शक्ति व्याप्त है वैसे ही निखिल विश्व मे प्राण का चैतन्य समुद्र भी भरा पड़ा है |जैसा श्रद्धा और साधना से गायत्री शक्ति को खीच कर अपने मे धारण किया जाता है वैसे ही अपने प्राणमय कोश को सतेज और चेतन करके विश्व व्यापी प्राणी से यथेष्ट मात्रा मे प्राण तत्व खीचा जा सकता है | यह भण्डार जितना अधिक होगा उतने ही हम प्राणवान बनेंगे और उसी अनुपात मे सांसारिक एवँ आध्यात्मिक संपत्तियां प्राप्त करने के अधिकारी हो जायेंगे ।

दीर्घ जीवन , उत्तम स्वस्थ्य , चैतन्यता , स्फूर्ति , उत्साह , क्रियाशीलता , कष्ट-सहिष्णुता , बुद्धि की सूक्ष्मता , सुंदरता , मनमोहकता आदि विशेषताएं प्राणशक्ति रुपी फुलझड़ी की छोटी छोटी चिंगारियां हैं |

 

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

गायत्री के पांच मुख पांच दिव्य कोश : अन्नमय कोश – ४

अन्नमय कोश की शुद्धि के चार साधन –३. तत्व-शुद्धि 

 

यह श्रृष्टि पंच तत्वों से बनी हुई है | प्राणियों के शरीर भी इन्ही तत्वों से बने हुए हैं | मिटटी , जल , वायु , अग्नि और आकाश इन् पांच तत्वों का यह सबकुछ संप्रसार है | जितनी वस्तुवें दृष्टिगोचर होती हैं या इन्द्रियों द्वारा अनुभाव मे आती हैं उन सब की उत्पत्ति पंच तत्वों द्वारा हुई हैं | वस्तुओं का परिवर्तन , उत्पत्ति , विकास तथा विनास इन् तत्वों की मात्रा मे परिवर्तन आने से ही होता है | यह प्रसिद्द है की जलवायु का स्वस्थ्य पर प्रभाव पड़ता है शीत प्रधान देशों के तथा यूरोपियन देशों का रंग रूप , कद -स्वस्थ्य अफ्रीका के उष्ण प्रदेश वासियों के रंग -रूप , कद , स्वस्थ्य से सर्वथा भिन्न होता है | पंजाबी , काश्मीरी , बंगाली , मद्रासी लोगों के शरीर तथा स्वस्थ्य की भिन्नता प्रत्यक्ष है | जलवायु का ही अंतर् है |

किन्ही प्रदेशों मे मलेरिया , पीला बुखार , पेचिस , चर्म रोग , फील पावं , कुष्ट आदि रोगों की बाढ़ सी रहती है और किन्ही स्थानों की जलवायु ऐसी होती है की वहाँ जाने पर तपेदिक सरीखे कष्ट साध्य रोग भी अच्छे हो जाते हैं | पशु पक्षी , घास -अन्न , फल , औषधि आदि के रंग ,रूप ,स्वस्थ्य , गुण , प्रकृति आदि मे भी जलवायु के अनुसार अंतर पड़ता है इस प्रकार वर्षा, गर्मी -सर्दी का तत्व-परिवर्तन प्राणियों मे अनेक प्रकार के सूक्ष्म परिवर्तन कर देता है |

आयुर्वेद शास्त्र मे वात , पित्त , कफ का असंतुलन रोगों का कारण बताया है | वात का अर्थ है वायु , पित्त का अर्थ है गर्मी और कफ का अर्थ है जल | पंच तत्वों मे पृथ्वी शरीर का स्थिर आधार है | मिटटी से ही शरीर बना है और जला देने या गाड़ देने पर मिटटी रूप मे ही इसका अस्तित्व रह जाता है | इसलिए पृथ्वी तत्व शरीर का स्थिर आधार होने से वह रोग आदि का कारण नहीं बनता |

दूसरे आकाश का सम्बन्ध मन से बुद्धि और इन्द्रियों की सूक्ष्म तन्मात्राओं से है | स्थूल शरीर पर जलवायु और गर्मी का ही प्रभाव पड़ता है और उन्ही प्रभावों के आधार पर रोग एवँ स्वस्थ्य बहुत कुछ निर्भर रहते हैं | वायु की मात्रा मे अंतर् आ जाने से गठिया , लकवा , दर्द , कंप , अकडना , गुल्म , हड्फुतन, नाडीविक्षेप आदि रोग होते हैं | तत्व के विकास से फोड़े -फुंसी , चेचक ज्वर, रक्त पित्त , हैजा , दस्त , क्षय ,स्वास उपदंश , रक्त विकार आदि बढते हैं |

जल तत्व की गडबडी से जलोदर ,पेचिस, संग्रहणी, मलमूत्र, प्रमेह स्वप्न दोष , सोम , प्रदर , जुकाम , खांसी आदि रोग पैदा होते हैं | अग्नि की मात्रा कम हो तो शीत , जिकाम , अकडन , अपच , शिथिलता शरीखे रोग उठ खड़े होते हैं | इस प्रकार अन्य तत्वों का घटना बढ़ना अनेक रोग उत्पन्न करता है |

Panchtatva

Panchtatva

आयुर्वेद के मत से मत से विशेष प्रभाव शाली , गतिशील सक्रीय एवँ स्थूल शरीर को स्थिर करने वाले कफ वात पित्त अर्थात जल वायु गर्मी ही है और दैनिक जीवन मे जो उतारचढाव होते रहते हैं उनमे इन् तीनों का ही प्रधान कारण होता है | फिर भी शेष दो तत्व पृथ्वी और आकाश शरीर पर स्थिर रूप मे काफी प्रभाव डालते हैं |

मोटा या पतला होना , लंबा या ठिगना होना , रूपवान या कुरूप होना , गोरा या काला होना , कोमल या सुदृढ़ होना शरीर मे पृथ्वी तत्व की स्थिति से सम्बंधित है | इसी प्रकार चतुरता – मूर्खता , सदाचार -दुराचार , नीचता -महानता , तीव्र बुद्धि , दूरदर्शिता व खिन्नता -प्रसन्नता एवँ गुण , कर्म , स्वभाव , इच्छा , आकांछा , भावना , आदर्श , लक्ष्य आदि बातें इस पर निर्भर रहती हैं की आकाश तत्व की स्थिति क्या है ? उन्माद , सनक , दिल की धडकन , अनिद्रा , पागलपन – दु: स्वप्न , मिर्गी , मूर्छा , घबडाहट , निराशा आदि रोग मे भी आकाश ही प्रधान कारण होता है | तत्वों की मात्रा मे गडबडी पड़ जाने से स्वस्थ्य मे निश्चित रूप से खड़ाबी आ जाती है | जल वायु सर्दी गर्मी ( ऋतू प्रभाव ) के कारण रोगी मनुष्य निरोग और निरोग रोगी बन सकता है |

योग साधकों को जान लेना चाहिए की पंच तत्वों से बने शरीर को सुरक्षित रखने का महत्व पूर्ण आधार यह है की देह मे सभी तत्व स्थिर मात्रा मे रहें | गायत्री के पांच मुख शरीर मे पांच तत्व बनकर निवास करते हैं यही पंच ज्ञानेन्द्रियों और पंच कर्मइन्द्रियों को क्रियाशील रखते हैं | लापरवाही , अव्यवस्था और आहार -विहार मे असंयम से तत्वों का संतुलन बिगड़ कर रोग ग्रस्त होना एक प्रकार से पंच मुखी गायत्री माता का देह -परमेश्वरी का तिरष्कार करना है |

 

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

गायत्री के पांच मुख पांच दिव्य कोश : अन्नमय कोश – ३

अन्नमय कोश की शुद्धि के चार साधन — २. आसन

ऋषियों ने आसनों को योग साधना मे इसलिए प्रमुख स्थान दिया है क्योकि ये स्वस्थ्य रक्षा के लिए अतीव उपयोगी होने के अतिरिक्त मर्म स्थानों मे रहने वाली ‘ हव्य- वहा ‘ और ‘कव्य- वहा ‘ तडित शक्ति को क्रियाशील रखते हैं| मर्म स्थल वे हैं जो अतीव कोमल हैं और प्रकृति ने उन्हें इतना सुरक्षित बनाया है की साधारणतः उन तक वाह्य प्रभाव नहीं पहुचता |

आसनों से इनकी रक्षा होती है | इन् मर्मों की सुरक्षा मे यदि किसी प्रकार की बाधा पड जाए तो जीवन संकट मे पड सकता है | ऐसे मर्म स्थान उदर और छाती के भीतर विशेष हैं | कंठ -कूप , स्कन्द , पुच्छ , मेरुदंड और वाह्य रंध्र से सम्बंधित ३३ मर्म हैं | इनमे कोई आघात लग जाए , रोग विशेष के कारण विकृति आ जाए , रक्ताभीषण रुक जाए और विष -बालुका जमा हो जाए तो देह भीतर ही भीतर घुलने लगती है | बाहर से कोई प्रत्यक्ष या विशेष रोग दिखाई नहीं पड़ता , पर भीतर ही भीतर देह खोखली हो जाती है | नाडी मे ज्वर नहीं होता पर मुह का कड़वा पन, शरीर मे रोमांच , भारीपन , उदासी , हडफुटन , सिर मे हल्का स दर्द , प्यास आदि भीतरी ज्वर जैसे लक्षण दिखाए पड़ते हैं | वैद्य डाक्टर कुछ समझ नहीं पाते , दवा -दारु देते हैं पर कुछ विशेष लाभ नहीं होता |

मर्मों मे चोट पहुचने से आकस्मिक मृत्यु हो सकती है | तांत्रिक अभिचारी मारण का प्रयोग करते हैं तो उनका आक्रमण इन् मर्म स्थलों पर ही होता है | हानि , शोक , अपमान आदि की कोई मानसिक चोट लगे तो मर्म स्थल क्षत -विक्षत हो जाती है और उस व्यक्ति के प्राण संकट मे पड जाते हैं | मर्म अशक्त हो जाएँ तो गठिया , गंज , स्वेत्कंठ, पथरी , गुर्दे की शिथिलता , खुश्की , बवासीर जैसे न ठीक होने वाले रोग उपज पड़ते हैं |

सिर और धड मे रहने वाले मर्मों मे ‘हव्य- वहा’ नामक धन विद्युत का निवास और हाथ पैरों मे ‘कव्य- वहा’ ऋण विद्युत की विशेषता है | दोनों का संतुलन बिगाड जाए तो लकवा , अर्धांग , संधिवात जैसे उपद्रव खड़े होते हैं |

कई बार मोटे , तगड़े स्वस्थ दिखाई पड़ने वाले मनुष्य भी ऐसे मंद रोगों से ग्रसित हो जाते हैं , जो उनकी शारीरिक अच्छी स्थिति को देखते हुए न होने चाहिए थे | इन् मार्मिक रोगों का कारण मर्म स्थानों की गडबडी है | कारण यह है की साधारण परिश्रम या कसरतों द्वारा इन मर्म स्थानों का व्यायाम नहीं हो पाता | औषधियों की पहुच वहाँ तक नहीं होती | शल्य क्रिया या सूची -भेद ( इंजेक्सन ) भी उनको प्रभावित करने मे समर्थ नहीं होते | उस विकत गुत्थी को सुलझाने मे केवल ‘योग -आसन ‘ ऐसे तीक्ष्ण अस्त्र हैं जो मर्म शोधन मे अपना चमत्कार दिखाते हैं |

ऋषियों ने देखा की अच्छा आहार -विहार रखते हुए भी, विश्राम -व्यायाम की व्यवस्था रखते हुए भी कई बार अज्ञात सूक्ष्म कारणों से मर्म स्थल विकृत हो जाता है और उसमे रहने वाली हव्य-वहा , कव्य -वहा तडित शक्ति का संतुलन बिगड़ जाने से बीमारी और कमजोरी आ धमकती है , जिससे योग साधना मे बाधा पड़ती है |

इस कठिनाई को दूर करने के लिए उन्होंने अपने दीर्घकालीन अनुसंधान और अनुभव द्वारा ‘आसन -क्रिया’ का आविष्कार किया | आसनों का सीधा प्रभाव हमारे मर्म स्थलों पर पड़ता है | प्रधान नस-नाड़ियों और मांसपेशियों के अतिरिक्त सूक्ष्म कशेरुकाओ का भी आसनों द्वारा ऐसा आकुंचन -प्राकुंचन होता है कि उसमे जमे हुए विकार हट जाते हैं तथा फिर नित्य सफाई होते रहने से नए विकार जमा नहीं होते | मर्म स्थलों की शुद्धि , स्थिरता एवँ परिपुष्टि के लिए आसनों को अपने ढंग का सर्वोत्तम उपचार कहा जा सकता है |

( आसन अनेक हैं उसमे से ८४ प्रधान हैं इनकी विस्तृत व्याख्या के लिए पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘बलवर्धक व्यायाम’ व् आसन प्राणायाम संबंधी अन्य साहित्य देखें )

आठ आसन ऐसे हैं जो सभी मर्म स्थानों पर अच्छा प्रभाव डालते हैं …

१. सर्वांगासन

Sarvang Asan

सर्वांगासन (Sarvang Asan)

२. बद्ध-पद्मासन

बद्ध-पद्मासन

बद्ध-पद्मासन (Baddh PAdmasan)

३.पाद हस्तासन

पाद हस्तासन (Padhastasan)

पाद हस्तासन (Padhastasan)

४. उत्कटासन

उत्कटासन (Utkat Asan)

उत्कटासन (Utkat Asan)

५. पश्चिमोत्तान आसन

पश्चिमोत्तान आसन (Paschimottan Asana)

पश्चिमोत्तान आसन (Paschimottan Asana)

६. सर्पासन

सर्पासन (Bhujang Asana or Sarp Asana)

सर्पासन (Bhujang Asana or Sarp Asana)

७. धनुरासन

धनुरासन  (Dhanurasana)

धनुरासन (Dhanurasana)

८. मयूरासन

मयूरासन (Mayurasana)

मयूरासन (Mayurasana)

Mayurasana Steps

Mayurasana Steps

 

इन् सभी से जो लाभ होता है उसका सम्मिलित लाभ सूर्य-नमस्कार से होता है | यह एक ही आसन कई आसनों के मिश्रण से बना है | इसे प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व करना चाहिए |

सूर्य-नमस्कार (Surya Namaskar)

सूर्य-नमस्कार (Surya Namaskar)

Surya Namaskar Breathing Steps

Surya Namaskar Breathing Steps

 

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

गायत्री के पांच मुख पांच दिव्य कोश : अन्नमय कोश – २

अन्नमय कोश की शुद्धि के चार साधन –  १. उपवास

अन्नमय कोश की अनेक सूक्ष्म विकृतियों का परिवर्तन करने मे उपवास वही काम करता है जो चिकित्सक के द्वारा चिकित्सा के पूर्व जुलाब देने से होता है | ( चिकित्सक इसलिए जुलाब आदि देते हैं क्योकि दस्त होने से पेट साफ़ हो और औषधि अपना काम कर सके )

मोटे तौर पर उपवास के लाभ -पेट मे रुका अपच पचता है , विश्राम करने से पाचक अंग नव चेतना के साथ दूना काम करते हैं , आमाशय मे भरे अपक्व अन्न से जो विष बनता है वह ऐसे मे बनना बंद हो जाता है , आहार की बचत से आर्थिक लाभ होता है | डाक्टरों का यह भी निष्कर्ष है की स्वल्पाहारी दीर्घ जीवी होते हैं | ( ठूस- ठूस कर खाने वाले पेट को चैन ना लेने देने वाले लोगों की जीवनी शक्ति को नुक्सान पहुचता है, आयु कम होती है , रोग ग्रस्तता होती है )

गीता मे ‘विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः’ श्लोक मे बताया गया है की उपवास से विषय -विकारों की निवृति होती है | मन का विषय विकारों से रहित होना एक बहुत बड़ा मानसिक लाभ है उसे ध्यान मे रखते हुए प्रत्येक शुभ कार्य के साथ उपवास को भारतीय परमपराओं मे जोड़ दिया गया है | ( कन्यादान के दिन माँ-बाप उपवास करते हैं , अनुष्ठान के दिन आचार्य और यजमान , नौ दुर्गा मे भी आंशिक या पूर्ण उपवास की परंपरा है …आदि )

रोगियों के लिए उपवास को ‘जीवन मूरी’ कहा गया है | संक्रामक , कष्टसाध्य एवँ खतरनाक रोगों मे लंघन भी चिकित्सा का एक अंग है | ( निमोनिया , प्लेग , सन्निपात , टाइफाइड मे उपवास कराया जाता है )

इस तथ्य को हमारे ऋषियों ने अनिवार्य समझा था | इसी कारण हर महीने कई उपवासों का धार्मिक महत्व स्थापित किया था |

Panchkosh Attributes

Panchkosh Attributes

अन्नमय कोश की शुद्धि के लिए उपवास का विशेष महत्व है | शरीर मे कई जाति की उपत्यिकाएँ देखी जाती हैं , उन्हें शरीर शास्त्री ‘ नाड़ी -गुच्छक ‘ कहते हैं |वैज्ञानिक इन् नाड़ी गुच्छक के कार्यों का कुछ विशेष परिचय अभी प्राप्त नहीं कर पाए हैं , पर योगी लोग जानते हैं की ये उपत्यिकाएँ शरीर मे अन्नमय कोश की बंधन ग्रंथियां हैं | मृत्यु होते ही सब बंधन खुल जाते हैं और फिर एक भी गुच्छक दृष्टिगोचर नहीं होता | सब उपत्यिकाएँ अन्नमय कोश के गुण दोषों का प्रतीक हैं | ‘इन्धिका’ जाति की उपत्यिकाएँ चंचलता , अस्थिरता , उद्विग्नता की प्रतीक हैं | जिन व्यक्तियों मे इस जाति के नाडी गुच्छक अधिक हों तो उनका शरीर एक स्थान पर बैठकर काम न कर सकेगा | ‘दीपिका’ जाति की उपत्यिकाएँ जोष , क्रोध ,शारीरिक उष्णता, अधिक पाचन ,गर्मी ,खुश्की आदि उत्पन्न करेंगी | ऐसे गुच्छकों की अधिकता वाले रोग चर्म रोग , फोड़ा , फुंसी , नकसीर फूटना , पीला पेशाब , आँखों मे जलन आदि रोगों के शिकार होते हैं | इसी प्रकार अन्य गुच्छक मोचिका , पूषा , चन्द्रिका आदि हैं इनकी अधिकता भिन्न -भिन्न प्रकार के रोगों के कारण बनते हैं | ऐसे उपत्यिकाओं की भिन्न भिन्न ९६ जातियां मानी जाती हैं | ये ग्रंथियां ऐसी हैं जो शारीरिक स्थिति को अच्छानुकूल बनाने मे बाधक होती हैं | मनुष्य चाहता है की मै अपने शरीर को ऐसा बनाऊ , वह उपाय भी करता है पर कई बार वे उपाय सफल नहीं होते | कारण यह है की ये उपत्यिकाएँ शरीर मे भीतर ही भीतर ऐसी क्रिया और प्रेरणा उत्पन्न करती हैं जो बाह्य प्रयत्नों को सफल नहीं होने देती और मनुष्य अपने आपको बार बार असफल एवँ असहाय महसूस करता है | अन्नमय कोश को शरीर से बांधने वाली ये उपत्यिकाएँ शारीरिक एवँ मानसिक अकर्मों मे उलझकर विकृत होती हैं तथा सत्कर्मों से सुव्यवस्थित रहती है | आहार विहार का संयम तथा सात्विक दिनचर्या ठीक रखना , प्रकृति के आदेशों पर चलने वालों की उपत्यिकाएँ सुव्यवस्थित रहती हैं | साथ ही कुछ अन्य यौगिक उपाय भी हैं जो उन आंतरिक विकारों पर काबू पा सकते हैं जिन्हें केवल वाह्य उपचारों से सुधारना कठिन है |

उपवास से उपत्यिकाओं के संशोधन , परिमार्जन और सुसंतुसन से बड़ा सम्बन्ध है | योग साधना मे उपवास का एक सुविस्तृत विज्ञान है | अमुक अवसर पर ; अमुक मास मे ; अमुक मुहूर्त मे ; अमुक प्रकार से उपवास करने का अमुक फल होता है | ऐसे आदेश शास्त्रों मे जगह जगह मिलते हैं | ऋतुओं के अनुसार शरीर की ६ अग्नियाँ न्यूनाधिक होती रहती हैं | ऊष्मा , बहुवृच , ह्वादी, रोहिता , आत्पता , व्याती यह ६ शरीरगत अग्नियाँ ग्रीष्म से लेकर बसंत तक ६ ऋतुओं मे क्रियाशील रहती हैं |

इनमे से प्रत्येक के गुण भिन्न -भिन्न हैं |

१. उत्तरायण , दक्षिणायन की गोलार्ध स्थिति
२. चन्द्रमा की बढ़ती घटती कलाएं
३. नक्षत्रों का भूमि पर आने वाला प्रभाव
४. सूर्य की अंश किरणों का मार्ग ,,

इनसे ऋतू अग्नियों का सम्बन्ध है अतः ऋषियों ने ऐसे पुण्य पर्व निश्चित किये हैं जिससे अमुक प्रकार से उपवास करने पर अमुक प्रभाव हो |

उपवासों के पांच भेद हैं —

१. पाचक ( जो पेट की अपच , अजीर्ण , कोष्ठबद्धता को पचाते हैं )
२. शोधक ( जो भूखे रहने पर रोगों को नष्ट करते हैं इन्हें लंघन भी कहते हैं )
३. शामक ( जो कुविचारों , मानसिक विकारों , दुष्प्रवृतियों एवँ विकृत उपत्यिकाओं को शमन करते हैं )
४. आनस ( जो किसी विशेष प्रयोजन के लिए , दैवी शक्ति को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किये जाते हैं )
५. पावस ( जो पापों के प्रायश्चित के लिए होते हैं ) ।

आत्मिक और मानसिक स्थिति के अनुरूप कौन सा उपवास उपयुक्त होगा और उसके क्या नियमोपनियम होने चाहिए इसका निर्णय करने के लिए गंभीरता की आवश्यकता है |

पाचक उपवास मे भोजन तब तक छोड़ देना चाहिये जब तक भूख ना लगे | एक दो दिन का उपवास करने से कब्ज पच जाता है | पाचक उपवास मे नीम्बू का रस या अन्य पाचक औषधि की सहायता ली जा सकती है | शोधक उपवास के साथ विश्राम आवश्यक है यह लगातार आवश्यक है जबतक रोग खतरनाक स्थिति से अलग हट जाए | शामक उपवास दूध , छाछ फलों का रस आदि पर चलते हैं | इसमें स्वाध्याय , मनन , एकांत सेवन , मौन , जप , ध्यान , पूजा , प्रार्थना आदि आत्म शुद्धि के उपचार भी साथ मे करने चाहिए | अनास उपवास मे सूर्य की किरणों द्वारा अभीष्ट दैवी शक्ति का आह्वान करना चाहिए | पावस उपवास मे केवल जल लेना चाहिए और सच्चे ह्रदय से प्रभु से क्षमा याचना करना चाहिए की भविष्य मे वैसा अपराध नहीं होगा |

साधारणतः सप्ताह मे एक दिन उपवास अवश्य रहना चाहिए | गायत्री साधक के लिए रविवार सर्वाधिक उपयुक्त है |

 

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

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