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The Republic of Philosophy – Our Collective Approach

The Republic of Philosophy

विनम्र निवेदन (A Kind Request)

राष्ट्र व् विश्व में आध्यात्मिकता को आधुनिक विज्ञान के, सामाजिकता के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुतीकरण आज बहुत आवश्यक है। जिस प्रकार देश के व् विश्व के वामपंथी बुद्धिजीवी देश की ऐतिहासिकता, सांस्कृतिकता , परम्परा, से खिलवाड़ किये जा रहे है, नई पीढ़ी को अनर्गल प्रलाप के साथ बहकाया जा रहा है उसके लिए एक समग्र प्रयास अवश्य होना चाहिए । हमारे मित्र मंडल के सभी मित्रगण किसी न किसी तरह से वैयक्तिक व् सामूहिक रूप में यह कार्य कर भी रहे है ।

Presentation and projection of the true spirituality in the context of modern science, modern socio-philosophical way, throughout the nation and across the globe, is very much necessary today. The leftist, anti national, pseudo rational intellectuals of the country and the world are trying their best to divert the psychology of people towards wrong side and deteriorating the country’s history, custom & culture, tradition, polluting and misinterpreting the ancient scriptures. The new generation is being seduced with unrestrained delirium.

So there must be an integral effort for them to save the true spirituality, philosophy, custom & culture , ancient text (and its true meaning) of the nation.

 

मैं चाहता हूं कि एक ऐसा प्लेटफॉर्म भी हों जहां वैयक्तिक प्रयास को बिना प्रभावित किये हुए सब लोग साथ मिलकर भी एक प्रयास करें ।

I always wanted to create a worldwide open portal where we all can put our collective and positive effort to preserve this ancient heritage which were given by our seer sages from the time immemorial.

 

ऐसे ही उद्देश्य के लिए एक पोर्टल का निर्माण किया गया है जिसमे व् जिसके माध्यम से विश्व व् भारतीय इतिहास, संस्कृति, आधुनिक विज्ञान, भौतिकी, ब्रह्माण्ड भौतिकी, भाषा शास्त्र, तुलनात्मक भाषा शास्त्र, धर्म विज्ञानं, दर्शन शास्त्र, शैवागम, तंत्र व् आगम ग्रन्थ, वेदादि उपनिषद पुराण , भारतीय दर्शन, पाश्चात्य दर्शन , तुलनात्मक दर्शनशास्त्र , प्राचीन भारतीय पुरातत्व व् वास्तुकला व् समस्त भारतीय दार्शनिको व् सभी मत मतान्तरों व् पथ के विद्वान् आचार्य के साहित्य लेखन सहित अन्य सभी विषयों पर आलेख व् विचारो का प्रस्तुतिकरण किया जायेगा ।

For the very same purpose a web portal has been created by which we shall analyse and put the articles from a very wide spectrum of knowledge including Indian History and Culture, Modern Science, Physics, Astrophysics, Lexicography, Philology, comparative philology, Theology, Philosophy (Oriental as well as Occidental), Shaivites Scripture, Tantra and Agama Scriptures, Vedas, Upanishads, Indian Philosophy, Comparative Philosophy, Ancient Archeology and works done and contributed by all indian acharya and philosophers of each and every sects of Inidan subcontinent.

 

हमारा उद्देश्य विचारो में क्रांति की अलख जगाने की है, सबसे युवा देश कहे जाने का गौरव तो प्राप्त है हमें परंतु हमारे राष्ट्र को स्वाबलंबी युवा, सशक्त युवा, विचारशील युवा, चरित्रवान युवा की आवश्यकता है, जिसके लिए कुविचारों के इस चक्रवात से टक्कर लेने के लिए सद्विचारों का तूफ़ान खड़ा करना होगा और आज के समय मे इंटरनेट का उपयोग इस कार्य के लिए अवश्य किया जा सकता है , किया जा भी रहा है।

 

भ्रष्ट व् विभाजनकारी बुद्धिजीवियों के चक्रव्यूह से आज के युवाओं को निकलना ही होगा । इसके लिए शुभस्य शीघ्रम के आधार पर ही कार्य करना होगा।

 

पोर्टल का नाम तत्वज्ञान परिषद ( The Republic of Philosophy ) है ।

Name of new Web portal is The Republic of Philosophy 

 

जिन किन्ही भाई व् बहन को इस महती कार्य में अपना अमूल्य योगदान देने का मन हो मुझसे (cpdarshi@integral-philosophy.com) अवश्य संपर्क करें , इस वेबसाइट की एक अलग user ID , password एवं email id दी जायेगी जिसका प्रयोग केवल इसके लिए किया जा सकता है । जो व्यक्ति निरंतर योगदान देना चाहते हैं उनके लिए यह आवश्यक है , इसके माध्यम से वे स्वयं ही अपने स्वतंत्र नाम से ही इस वेबसाइट पर अपने आलेख प्रकाशित कर पाएंगे ।

 

Whoever want to contribute their articles related to aforementioned subjects may contact me on my email ID cpdarshi@integral-philosophy.com. For this we shall provide a unique separate email ID and USer Id and password to login on that portal so that you will be able to publish your own article on your own name.

 

 

अधिक नहीं महीने में , सप्ताह में बस एक घंटे का समय इस कार्य के लिए निकाला जा सकता है ।

 

जो भाई यदा कदा सहयोग देना चाहते हैं वे निम्नलिखित email पर अपने आलेख भेज सकते हैं

 

The Person who can not contribute regularly can send their article on below mail Id, we shall publish that by their name

 

article@integral-philosophy.com

 

किसी अन्य सुझाव , सलाह, विचार विमर्श, या शिकायत के लिए मुझसे संपर्क किया जा सकता है ।

 

For any further suggestion, improvement and complaints, feel free to contact me 

cpdarshi@integral-philosophy.com

+91-9632426139 (WhatsApp/Hike).

 

 

All subscribers of this blog are highly requested to follow the new website channel,

(The Republic of Philosophy).

 

All articles of this blog have been migrated to that site also and this blog may suspend for further access for security reasons.

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प्राणमय कोश की साधना – 6

मुद्रा – विज्ञान

मुद्राओं से ध्यान में तथा चित्त को एकाग्र करने में बहुत सहायता मिलती है। इनका प्रभाव शरीर की आंतरिक ग्रन्थियों पर पड़ता है। इन मुद्राओं के माध्यम से शरीर के अवयवों तथा उनकी क्रियाओं को प्रभावित, नियन्त्रित किया जा सकता है। विभिन्न प्रकार के साधना के उपचार क्रमों में इन्हें विशिष्ट आसन, बंध तथा प्राणायामों के साथ किया जाता है। मुद्रायें यों तो अनेक हठयोग के अन्तर्गत वर्णित हैं। अनेक प्रयोजनों के लिए उनका अलग-अलग महत्व है। उनमें कुछ ध्यान के लिए उपयुक्त हैं, कुछ आसनों की पूरक हैं, कुछ तान्त्रिक प्रयोगों एवं हठयोग के अंगों के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन सबके विस्तार में जाना न तो उपयोगी है और न आवश्यक।

प्रस्तुत पंचकोश अनावरण के अन्तर्गत जिन मुद्राओं को महत्वपूर्ण पाया गया है उनका विवरण यहाँ दिया जा रहा है। वे हैं-      

(१) महामुद्रा

(२) खेचरी मुद्रा

(३) विपरीत करणी मुद्रा

(४) योनि मुद्रा

(५) शाम्भवी मुद्रा

(६) अगोचरी मुद्रा

(७ )भूचरी मुद्रा

(१) महामुद्रा

बाएँ पैर की एडी़ को गुदा तक मूत्रेन्द्रिय के बीच सीवन भाग में लगावें और दाहिना पैर लम्बा कर दीजिए। लम्बे किये हुए पैर के अँगूठे को दोनों हाथों से पकड़े रहिये। सिर को घुटने से लगाने का प्रयत्न कीजिए। नासिका के बाएँ छिद्र से साँस पूरक खींचकर कुछ देर कुम्भक करते हुए दाहिने छिद्र से रेचक प्राणायाम कीजिए। आरम्भ में पाँच प्राणायाम बाईं मुद्रा से करने चाहिये, फिर दाएँ पैर को सकोड़कर गुदा भाग से लगायें और बाएँ पैर को फैलाकर दोनों हाथों से उसका अँगूठा पकड़ने की क्रिया करनी चाहिये। इस दशा में दाएँ नथुने से पूरक और बाएँ से रेचक करना चाहिये। जितनी देर बाएँ भाग से यह मुद्रा की थी उतनी ही देर दाएँ भाग से करनी चाहिये।

Mahamudra

Mahamudra

इस महा-मुद्रा से कपिल मुनि ने सिद्धि प्राप्त की थी। इससे अहंकार, अविद्या, भय द्वेष, मोह आदि के पंच क्लेशदायक विकारों का शमन होता है। भगन्दर, बवासीर, सग्रहिणी, प्रमेह आदि रोग दूर होते हैं। शरीर का तेज बढ़ता है और वृद्धावस्था दूर हटती जाती है।

(२) खेचरी मुद्रा

जीभ को उलटी करके उसे उलटना और तालू के गड़्ढे में जिह्वा का अग्र भाग लगा देने को खेचरी मुद्रा कहते हैं। तालू के गट्टे भाग में एक पोला स्थान है जिसमें आगे चलकर माँस की एक सूँड सी लटकती है, उसे कपिल कुहर भी कहते हैं। यही स्थान जिह्वा के अग्रभाग को लगाने का होता है।

प्राचीनकाल में जिह्वा को लम्बी करने के लिए कुछ ऐसे उपाय काम में लाये गये थे, जो वर्तमान परिस्थिति में आवश्यक नहीं है। १-जिह्वा को इस तरह दुहना जैसे पशु के थन को दुहते हैं, २-जिह्वा को शहद, कालीमिर्च आदि से सहलाते हुए आगे की ओर सूँतना या खींचना, ३-जीभ के नीचे नाड़ी तन्तुओं को काट देना, ४-लोहे की शलाका से दबा-दबा कर जीभ बढ़ाना। यह क्रिया देश, काल, ज्ञान की वर्तमान स्थिति के अनुरूप नहीं है। जैसे अब प्राचीनकाल की भाँति हजारों वर्ष तक निराहार तप कोई नहीं कर सकता, वैसे ही खेचरी मुद्रा के लिए जिह्वा बढ़ाने के लिए कष्टसाध्य उपाय भी अब असामयिक हैं।

काली मिर्च और शहद की जिह्वा पर हल्की मालिश कर देने से वहाँ के तन्तुओं में उत्तेजना आ जाती है और उसे पीछे की ओर लौटने में सहायता मिलती है। इस रीति से जिह्वा के अग्रभाग को तालु गह्वर में लगाने का प्रयत्न करना चाहिये। जिह्वा धीरे-धीरे चलती रहे, जिसमें तालु गह्वर की हल्की-सी मालिश होती रहे। भूमध्य भाग में रखनी चाहिये।

खेचरी मुद्रा कपाल गह्वर में होकर प्राण-शक्ति का संचार होने लगता है और सहस्रदल कमल में अवस्थित अमृत निर्झर झरने लगता है, जिसके आस्वादन से एक बड़ा ही दिव्य आनन्द आता है। प्राण की उधर्वगति हो जाने से मृत्यु काल में जीव ब्रह्मरन्ध्र में होकर ही प्रयाण करता है, इसलिए उसे मुक्ति या सद्गति प्राप्त होती है। गुदा आदि अधोमार्गों से प्राण निकलता है, वह नरकगामी तथा मुख, नाक, कान से प्राण छोड़ने वाला मृत्युलोक में भ्रमण करता है, किन्तु जिसका जीव ब्रह्मरन्ध्र में होकर जायेगा वह अवश्य ही सद्गति को प्राप्त करेगा। खेचरी मुद्रा द्वारा ब्रह्माण्डस्थित शेषशायी सहस्रदल निवासी परमात्मा से साक्षात्कार होता है। यह मुद्रा बड़ी ही महत्वपूर्ण है।

(३) विपरीत करणी मुद्रा- मस्तक को जमीन पर रखकर दोनों हाथों को उसके समीप रखना और पैरों को सीधे ऊपर की ओर उल्टे करना इसे विपरीत करणी मुद्रा कहते हैं। शीर्षासन भी इसी का नाम है। सिर का नीचा और पैर का ऊपर होना इसका प्रधान लक्षण है।

तालू के मूल से चन्द्र नाड़ी और नाभि के मूल से सूर्य नाड़ी निकलती है। इन दोनों के उद्गम स्थान विपरीत-करणी मुद्रा द्वारा सम्बन्धित हो जाते हैं। ऋषि-प्राण और धन-प्राण का इस मुद्रा द्वारा एकीकरण होता है। जिससे मस्तिष्क को बल मिलता है।

(४) योनि मुद्रा- इसे षड्मुखी भी कहते हैं। पद्मासन पर बैठकर दोनों हाथों के अँगूठों से दोनों कान, दोनों हाथ की तर्जानियों से दोनों आँखें, दोनों मध्यमाओं से दोनों कानों के छिद्र और दोनों अनामिकाओं से मुँह बन्द कर देना चाहिये। होठों को कौए की चोंच की तरह बाहर निकाल कर धीरे-धीरे साँस खींचते हुए उसे गुदा तक ले जाना चाहिये। फिर उल्टे क्रम से धीरे-धीरे निकाल देना चाहिये। योनि मुद्रा की यह साधना योग सिद्धि में बड़ी सहायक सिद्ध होती है।

(५) शाम्भवी मुद्रा- आसन लगाकर दोनों भौहों के बीच में दृष्टि को जमाकर भ्रकुटी में ध्यान करने को शाम्भवी मुद्रा कहते हैं। कहीं-कहीं अधखुले नेत्र और ऊपर चढ़ी हुई पुतलियों से जो शान्त चित्त ध्यान किया जाता है उसे भी शाम्भवी मुद्रा कहा है। भगवान शम्भू के द्वारा साधित होने के कारण इन साधनाओं का नाम शाम्भवी मुद्रा पड़ा है।

(६) अगोचरी मुद्रा-नासिका से चार उँगली आगे के शून्य स्थान पर दोनों नेत्रों की दृष्टि को एक बिन्दु पर केन्द्रित करना।

(७) भूचरी मुद्रा – नासिका से चार अंगुल आगे के शून्य स्थान पर दोनों नेत्रों की दृष्टि को एक बिंदु पर केंद्रित करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त नभो मुद्रा, महा-बंध शक्तिचालिनी मुद्रा, ताडगी, माण्डवी, अधोधारण ,आम्भसी, वैश्वानरी, बायवी, नभोधारणा, अश्वनी, पाशनी, काकी, मातंगी, धुजांगिनी आदि २५ मुद्राओं का घेरण्ड-सहिता में सविस्तार वर्णन है। यह सभी अनेक प्रयोजनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। प्राणमय कोश के अनावरण में जिन मुद्राओं का प्रमुख कार्य है, उनका वर्णन ऊपर कर दिया है। अब ९६ प्राणायामों में से प्रधान १ प्राणायामों का उल्लेख नीचे करते हैं।

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

प्राणमय कोश की साधना – 5

तीन बन्ध

दस प्राणों को सुसुप्त दशा से उठाकर जागृत करने, उसमें उत्पन्न हुई कुप्रवृत्तियों का निवारण करने, प्राण शक्ति पर परिपूर्ण अधिकार एवं आत्मिक जीवन को सुसम्पन्न बनाने के लिए प्राण-विद्या’ का जानना आवश्यक है। जो इस विद्या को जानता है, उसको प्राण सम्बन्धी न्यूनता एवं विकृति के कारण उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ दुःख नहीं देती।

प्राण विद्या को ही हठयोग भी कहते हैं। हठयोग के अन्तर्गत प्राण परिपाक के लिए (१) बंध, (२) मुद्रा और (३) प्राणायाम के साधन बताये गये हैं। तीन बन्ध और प्राणायामों का वर्णन नीचे किया जाता है।

(१) मूल बंध

प्राणायाम करते समय गुदा के छिद्रों को सिकोड़कर ऊपर की ओर खींचे रखना मूल-बंध कहलाता है। गुदा को संकुचित करने से ‘अपान’ स्थिर रहता है। वीर्य का अधः प्रभाव रुककर स्थिरता आती है। प्राण की अधोगति रुककर ऊर्ध्वगति होती है। मूलाधार स्थित कुण्डलिनी में मूल-बंध से चैतन्यता उत्पन्न होती है। आँतें बलवान होती हैं, मलावरोध नहीं होता रक्त-संचार की गति ठीक रहती है। अपान और कूर्म दोनों पर ही मूल-बंध का प्रभाव रहता है। वे जिन तन्तुओं में बिखरे हुए फैले रहते हैं, उनका संकुचन होने से यह बिखरापन एक केन्द्र में एकत्रित होने लगता है।      

Mula Bandh

Mula Bandh

mulabandh

२) जालंधर बंध

मस्तक को झुकाकर ठोड़ी को कण्ठ-कूप ( कण्ठ में पसलियों के जोड़ पर गड्डा है, उसे कण्ठ-कूप कहते हैं ) में लगाने को जालंधर-बंध कहते हैं। जालंधर बंध से श्वास-प्रश्वास क्रिया परअधिकार होता है।  ज्ञान-तन्तु बलवान होते हैं। हठयोग में बताया गया है कि इस बन्ध का सोलह स्थान की नाड़ियों पर प्रभाव पड़ता है। १-पादांगुष्ठ, २-गुल्फ, ३-घुटने, ४-जंघा, ५-सीवनी, ६ -लिंग, ७-नाभि, ८-हदय, ९-ग्रीवा १०-कण्ठ ११-लम्बिका, १२-नासिका, १३-भ्रू, १४-कपाल, १५-मूर्धा और १६-ब्रह्मरंध्र। यह सोलह स्थान जालंधर बंध के प्रभाव क्षेत्र हैं, विशुद्धि चक्र के जागरण में जालंधर बन्ध से बड़ी सहायता मिलती है।

Jalandhar Bandh

Jalandhar Bandh

३) उड्डियान बंध

पेट में स्थित आँतों को पीठ की ओर खींचने की क्रिया को उड्डियान बंध कहते हैं। पेट को ऊपर की ओर जितना खींचा जा सके उतना खींचकर उसे पीछे की ओर पीठ में चिपका देने का प्रयत्न इस बंध में किया जाता है। इसे मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाला कहा गया है।

uddiyana-bandha

जीवनी शक्ति को बढ़ाकर दीर्घायु तक जीवन स्थिर रखने का लाभ उड्डियान से मिलता है। आँतों की निष्क्रियता दूर होती है। अन्त्र पुच्छ, जलोदर, पाण्डु यकृत वृद्धि, बहु मूत्र सरीखे उदर तथा मूत्राशय के रोगों में इस बंध से बड़ा लाभ होता है। नाभि स्थित ‘समान’ और ‘कृकल’ प्राणों से स्थिरता तथा बात, पित्त कफ की शुद्धि है। सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुलता है और स्वाधिष्ठान चक्र में चेतना आने से वह स्वल्प श्रम से ही जागृत होने योग्य हो जाता है।

Reference Books:

  1.  गायत्री महाविज्ञान – पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
  2. गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उनकी उपलब्धियां – पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

Protected: परम ऋत ( ऋतम् ) का तत्वज्ञान : 2

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